ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करना या बदलना जज की ईमानदारी पर सवाल नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
14 March 2026 9:28 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि ट्रायल कोर्ट का कोई आदेश किसी ऊपरी अदालत ने रद्द किया या बदल दिया, तो इससे संबंधित न्यायिक अधिकारी की काबिलियत, ईमानदारी या क्षमता पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता, जब तक कि इस बारे में कोई खास प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज न की गई हो।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि इस तरह की न्यायिक जांच अदालतों की पदानुक्रमित संरचना की एक स्वाभाविक विशेषता है और यह न्यायिक प्रक्रिया के सामान्य क्रम का हिस्सा है।
कोर्ट ने कहा,
"...यह तथ्य कि किसी अदालत (चाहे वह ट्रायल कोर्ट हो या हाईकोर्ट) द्वारा पारित किसी आदेश पर रोक लगा दी गई, उसे बदल दिया गया, या किसी ऊपरी अदालत (जैसे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट) ने उसमें किसी तरह का दखल दिया तो इसे अपने आप में उस जज की काबिलियत या क्षमता पर सवाल नहीं माना जा सकता जिसने वह आदेश पारित किया था।"
जस्टिस शर्मा ने यह टिप्पणी न्यायिक अधिकारी द्वारा दायर उस अर्जी को खारिज करते हुए की, जिसमें उन्होंने 2023 में एक आपराधिक रिट याचिका पर दिए गए फ़ैसले में अपने खिलाफ की गई कथित प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने की मांग की थी।
यह तर्क दिया गया कि पुलिस अधिकारियों के खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाते समय की गई कुछ टिप्पणियों से उनके सर्विस रिकॉर्ड को नुकसान पहुंचा है, जिसमें उनकी ACR (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) का कथित तौर पर डाउनग्रेड होना और उनका तबादला शामिल है।
उन्होंने दलील दी कि पिछला फ़ैसला उन्हें बिना कोई नोटिस दिए और ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड की जाँच किए बिना ही पारित कर दिया गया।
यह भी कहा गया कि वह फ़ैसला न्यायिक अधिकारियों के बीच प्रसारित किया गया, जिसमें कवरिंग लेटर में उनका नाम भी लिखा था, जिससे उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ी और उनके करियर की संभावनाओं पर बुरा असर पड़ा।
राहत देने से इनकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि पिछले फ़ैसले में जज के खिलाफ कोई निजी टिप्पणी दर्ज नहीं की गई, बल्कि उसमें सिर्फ़ ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेशों की वैधता की जांच की गई।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए, सिर्फ़ इसलिए कि ट्रायल कोर्ट के किसी आदेश को हाईकोर्ट ने रद्द किया, बदल दियाहै, या उस पर रोक लगाई (या कुछ हद तक बदला है या कुछ हद तक रद्द किया, जैसा कि इस मामले में हुआ), तो बिना किसी खास प्रतिकूल टिप्पणी के संबंधित न्यायिक अधिकारी की सामान्य काबिलियत, क्षमता या ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता।"
कोर्ट ने कहा कि न्यायिक आदेशों की पदानुक्रमित जांच भारतीय न्यायिक प्रणाली की एक ज़रूरी विशेषता है, जिसमें आदेशों की जांच अलग-अलग स्तरों पर की जाती है, लेकिन मूल रूप से कानून के अनुसार ही की जाती है। कोर्ट ने यह साफ़ किया कि 2023 के फ़ैसले में न्यायिक अधिकारी का नाम नहीं था, बल्कि सिर्फ़ "ट्रायल कोर्ट" का ज़िक्र था, क्योंकि उस समय आदेश की वैधता की जांच हो रही थी, न कि जज के आचरण की।
कोर्ट ने आगे यह भी साफ़ किया कि 2023 के फ़ैसले में की गई टिप्पणियां सिर्फ़ रिट याचिका के निपटारे तक ही सीमित थीं, और जज की सालाना गोपनीय रिपोर्ट (ACR) या सर्विस रिकॉर्ड का मूल्यांकन करते समय उन्हें कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं माना जाएगा।
कोर्ट ने इस शिकायत पर भी ध्यान दिया कि फ़ैसले को सर्कुलेट करते समय साथ में भेजे गए पत्र (कवरिंग लेटर) में न्यायिक अधिकारी का नाम लिखा गया। साथ ही कहा कि जहां तक हो सके, फ़ैसले को सर्कुलेट करते समय जज के नाम के बजाय कोर्ट के पदनाम का ज़िक्र किया जाना चाहिए।
Title: SANJAY KUMAR SAIN v. STATE

