POCSO Case: आरोपी की कम उम्र और नाबालिग से प्रेम संबंध जमानत के लिए राहतकारी पहलू, दिल्ली हाईकोर्ट ने दी जमानत
Amir Ahmad
7 Oct 2026 5:10 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO Act के मामले में आरोपी और नाबालिग पीड़िता की कम उम्र, दोनों के बीच लंबे समय से रहा अंतरंग एवं प्रेम संबंध तथा घटना से पहले पीड़िता के आचरण जैसे पहलू जमानत पर विचार करते समय राहतकारी परिस्थितियां हो सकते हैं।
जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने यह टिप्पणी 14 वर्षीय लड़की से यौन अपराध के आरोपी 20 वर्षीय युवक को जमानत देते हुए की।
कोर्ट ने कहा कि आरोपी और पीड़िता दोनों की कम उम्र को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों से दोनों के बीच कई महीनों से अंतरंग और प्रेम संबंध होने के संकेत मिलते हैं। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि पुलिस द्वारा दर्ज शुरुआती बयान में पीड़िता ने कहा था कि वह अपनी मर्जी से घर से गई थी और उसे किसी के खिलाफ कोई शिकायत नहीं थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि इन तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और ये ऐसे राहतकारी पहलू हैं, जो जमानत देने के पक्ष में संतुलन को झुकाते हैं।
मामला जुलाई 2023 में दर्ज उस FIR से जुड़ा है, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 363, 368, 376, 328 और 34 तथा POCSO Act की धाराओं 6 और 21 के तहत मामला दर्ज किया गया। यह FIR पीड़िता के पिता की ओर से 28 जुलाई 2023 को नाबालिग बेटी के लापता होने की शिकायत के आधार पर दर्ज की गई।
पीड़िता को 30 जुलाई 2023 को बरामद कर लिया गया। इसके बाद दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 161 के तहत दर्ज उसके शुरुआती बयान में उसने कहा था कि मां की डांट के बाद वह खुद घर से निकली थी और अपनी मौसी के घर चली गई। उसने उस समय किसी के खिलाफ शिकायत करने से भी इनकार किया।
हालांकि, बाद में पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने पास रखा और उसके साथ यौन संबंध बनाए। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता ने अलग-अलग तारीखों पर अलग-अलग बयान दिए। रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि उसने आरोपी के साथ अपनी तस्वीरें इंस्टाग्राम पर साझा की थीं और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए उसके प्रति अपने प्रेम का इजहार किया था।
अभियोजन ने जमानत का विरोध करते हुए आरोपों की गंभीरता पर जोर दिया। अभियोजन की ओर से कहा गया कि POCSO मामलों में सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत देते हुए यह भी ध्यान में रखा कि वह तीन साल से अधिक समय जेल में रह चुका है। कोर्ट ने कहा कि मुकदमे में कुल 19 अभियोजन गवाह हैं, लेकिन अब तक केवल पीड़िता और उसके पिता की गवाही हुई है। ऐसे में मुकदमे के जल्द समाप्त होने की संभावना नहीं है।
कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि आरोपी का कोई आपराधिक पूर्व इतिहास नहीं है। इसके अलावा आरोपी और पीड़िता एक ही इलाके में नहीं रहते, बल्कि शहर के अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को 30 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक जमानती के आधार पर जमानत दी।
कोर्ट ने आरोपी को प्रत्येक सुनवाई की तारीख पर ट्रायल कोर्ट में उपस्थित होने, अपना आवासीय पता जांच अधिकारी को उपलब्ध कराने और मोबाइल नंबर चालू रखने का निर्देश दिया। उसे प्रत्येक सोमवार सुबह 9 बजे संबंधित पुलिस थाने में रिपोर्ट करने के लिए भी कहा गया।
आरोपी को मामले से जुड़े किसी व्यक्ति को धमकाने, प्रभावित करने या कोई प्रलोभन देने तथा साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने से भी रोक दिया गया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत आवेदन के निपटारे तक सीमित हैं। इन टिप्पणियों का मुकदमे की सुनवाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और इन्हें मामले के गुण-दोष पर कोर्ट की राय नहीं माना जाएगा।
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