जमीन घोटाला मामले में CBI की FIR के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचे लालू प्रसाद

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    आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भूमि के बदले नौकरी घोटाले मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा उनके खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की मांग करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यादव ने मामले में CBI द्वारा दायर तीन आरोपपत्रों को रद्द करने के साथ-साथ उक्त आरोपपत्रों पर संज्ञान लेने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेशों को भी रद्द करने की मांग की।

    जस्टिस रविंदर डुडेजा ने यादव की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और केंद्रीय जांच एजेंसी के वकील की संक्षिप्त सुनवाई की। मामले में बाद में आदेश पारित किया जाएगा।

    सिब्बल ने कहा कि CBI ने आरजेडी प्रमुख के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए कोई पूर्व अनुमति नहीं ली थी, जो PC Act की धारा 17ए के तहत अनिवार्य है।

    जज ने सिब्बल से कहा कि आरोप तय करने के समय स्पेशल जज के समक्ष याचिका [मुकदमा चलाने की मंजूरी न मिलने] पर विचार किया जा सकता है। इस पर सिब्बल ने जवाब दिया कि ट्रायल कोर्ट ने पहले ही CBI द्वारा दायर आरोपपत्रों पर संज्ञान ले लिया है और इस मुद्दे पर अपना विचार नहीं बदलेगा।

    उन्होंने कहा,

    "अगर आरोप तय हो जाते हैं तो मैं कहां जाऊंगा?"

    इस पर जस्टिस डुडेजा ने कहा:

    "आरोप लगाने के चरण में आपके पास एक और मौका है। आप उस दरवाजे को क्यों बंद करना चाहते हैं?... आपके पास एक और दरवाजा उपलब्ध है।"

    सिब्बल ने जवाब दिया कि यादव CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने के हकदार हैं, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लिया गया संज्ञान अपने आप में गलत था।

    उन्होंने कहा,

    "मेरे पास CrPC की धारा 482 है। मुझे ट्रायल कोर्ट में क्यों जाना चाहिए?... संज्ञान अपने आप में गलत है।"

    CBI की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि यादव ने एक लोक सेवक के रूप में अपने पद का दुरुपयोग किया। इसलिए PC Act की धारा 19 को लागू करना आवश्यक है।

    उन्होंने कहा,

    "मंत्री के करीबियों ने सरकारी कर्मचारियों को ये चयन करने के लिए कहा था। नौकरियां दी गईं, जमीन ली गई। उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया है। PC Act की धारा 19 को लागू करना जरूरी था। PC Act की धारा 19 लागू की गई।"

    ट्रायल कोर्ट के समक्ष आरोप तय करने पर रोक लगाने या टालने की प्रार्थना करते हुए सिब्बल ने कहा कि "अवैध संज्ञान" पर आरोप नहीं सुने जा सकते।

    उन्होंने कहा:

    "कृपया देखें कि आरोप पत्र में क्या लिखा है। लालू प्रसाद यादव और अन्य ने भारतीय रेलवे के विभिन्न क्षेत्रों के महाप्रबंधक और अन्य अधिकारियों के साथ साजिश रची और उन साजिशों को आगे बढ़ाने के लिए उनके माध्यम से धन एकत्र किया। आरोप यह है कि मैं उन लोगों के साथ साजिश में शामिल था। फिर उन्होंने कहा कि धारा 17ए की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मेरी पहले कोई भूमिका नहीं थी। इसलिए मुझे 17ए की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। यह भी तथ्यात्मक रूप से गलत है। अवैध संज्ञान पर आरोप नहीं सुना जा सकता। अगर उन्होंने 14 साल इंतजार किया तो वे एक महीने भी इंतजार नहीं करेंगे।

    यादव का कहना है कि मामले में जांच भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए के तहत अनिवार्य मंजूरी प्राप्त किए बिना शुरू की गई है। याचिका के अनुसार, स्पेशल जज द्वारा उक्त अवैधता को भी नजरअंदाज किया गया। यादव ने तर्क दिया है कि उन्हें निष्पक्ष जांच के उनके मौलिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए "अवैध प्रेरित जांच" के माध्यम से पीड़ित किया जा रहा है।

    याचिका में कहा गया,

    "ऐसी मंजूरी के बिना कोई भी जांच/जांच/जांच शुरू से ही बेकार होगी। PC Act की धारा 17ए कष्टप्रद मुकदमेबाजी से एक फिल्टर प्रदान करती है। शासन के प्रतिशोध और राजनीतिक प्रतिशोध का वर्तमान परिदृश्य ठीक वही है, जिसे धारा 17ए निर्दोष व्यक्तियों की रक्षा करके प्रतिबंधित करना चाहती है। इस तरह की मंजूरी के बिना जांच शुरू करना शुरू से ही पूरी कार्यवाही को प्रभावित करता है और यह एक अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटि है।"

    इसमें कहा गया कि PC Act की धारा 17ए के तहत प्रारंभिक जांच और FIR दर्ज करने पर रोक है, क्योंकि यह लोक सेवकों से संबंधित है। याचिका में कहा गया कि आरोप पत्र दाखिल करना और संज्ञान आदेश पारित करना और उसके बाद की सभी कार्रवाइयां समाप्त होनी चाहिए।

    CBI ने 10 अक्टूबर, 2022 को 16 लोगों के खिलाफ मामले में आरोप पत्र दाखिल किया। इस मामले में लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटी मीसा भारती और अन्य व्यक्ति आरोपी हैं। एजेंसी का मामला है कि बिहार के विभिन्न निवासियों को 2004 से 2009 तक मुंबई, जबलपुर, कोलकाता, जयपुर और हाजीपुर में रेलवे के विभिन्न क्षेत्रों में "ग्रुप-डी पदों" पर स्थानापन्न के रूप में नियुक्त किया गया।

    यह आरोप लगाया गया कि इसके बदले में व्यक्तियों ने स्वयं या उनके परिवारों ने तत्कालीन केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के परिवार के सदस्यों और मेसर्स एके इंफोसिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड नामक एक कंपनी के नाम पर अपनी जमीन हस्तांतरित कर दी, जिसे बाद में उनके परिवार के सदस्यों ने अपने कब्जे में ले लिया।

    CBI ने दावा किया कि रेलवे में की गई नियुक्तियां भारतीय रेलवे द्वारा नियुक्तियों के लिए स्थापित मानकों और दिशानिर्देशों के अनुरूप नहीं थीं।

    Title: SHRI LALU PRASAD YADAV v. CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION

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