'Right To Be Forgotten: दिल्ली हाईकोर्ट का सवाल- क्या अदालती रिकॉर्ड को पूरी तरह से छिपाना ज़रूरी है?

Shahadat

9 Sept 2026 8:02 PM IST

  • Right To Be Forgotten: दिल्ली हाईकोर्ट का सवाल- क्या अदालती रिकॉर्ड को पूरी तरह से छिपाना ज़रूरी है?

    दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को सवाल उठाया कि क्या अदालती रिकॉर्ड तक पहुंच को रोकने के लिए कोई "ब्लैंकेट" (सब पर लागू होने वाला) आदेश ज़रूरी है। कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति की प्राइवेसी किसी खास अदालती रिकॉर्ड से प्रभावित होती है, वह उचित राहत के लिए संबंधित कोर्ट में जा सकता है।

    जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस विनोद कुमार की बेंच उन अपीलों पर सुनवाई कर रही थी, जो कानूनी डेटाबेस वेबसाइट 'इंडियन कानून' ने दायर की थीं। ये अपीलें एक सिंगल जज के उस फैसले को चुनौती देने के लिए थीं, जिसमें वेबसाइट को अदालती रिकॉर्ड में नाम के आधार पर सर्च करने की सुविधा बंद करने का निर्देश दिया गया।

    जस्टिस शंकर ने कहा,

    "हम बस सोच रहे हैं। अब तक जो पढ़ा है, उसे देखते हुए हम सोच रहे हैं कि इस मुकदमे का मकसद क्या था? मान लीजिए कोई ऐसा केस है जिसमें किसी को लगता है कि उसका निजी हित या प्राइवेसी का अधिकार बुरी तरह प्रभावित हो रहा है, या किसी खास रिपोर्ट में उसकी पहचान को डी-इंडेक्स या मास्क (छिपाया) किया जाना चाहिए। तो यह उस व्यक्ति का काम है कि वह उस केस के मामले में संबंधित कोर्ट में जाए और कोर्ट उस पर विचार करे। यह कहने का क्या मकसद है कि मुझे एक ऐसा ग्लोबल आदेश चाहिए जिससे मेरे नाम तक कोई पहुँच न हो या नाम के आधार पर सर्च न किया जा सके?"

    यह बात तब कही गई, जब प्लेटफॉर्म की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने कहा कि ऑनलाइन फैसलों तक पहुंच "जनहित" का काम करती है और ऐसे आदेशों को रोका नहीं जा सकता, भले ही बाद में किसी व्यक्ति को बरी कर दिया जाए, आरोप मुक्त कर दिया जाए या दोषी ठहराया जाए।

    बता दें, सिंगल जज ने "भूल जाने के अधिकार" (Right to be Forgotten) को मान्यता दी और ऑनलाइन उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड से निजी जानकारी को डी-इंडेक्स और मास्क करने का तरीका तय किया।

    'इंडियन कानून' का तर्क है कि यह फैसला 'ओपन जस्टिस' (खुली न्याय प्रक्रिया) के सिद्धांतों और अदालती रिकॉर्ड तक जनता की पहुँच के अधिकार को बेवजह सीमित करता है।

    सुनवाई के दौरान, दातार ने कहा कि सबसे बड़ा जनहित यह है कि सभी फैसले - चाहे वे बरी करने, आरोप मुक्त करने या दोषी ठहराने के हों - अदालती रिकॉर्ड का हिस्सा बने रहें।

    उन्होंने कहा कि सिंगल जज के आदेश को पलटा जाना चाहिए और एक बार जब कोई फैसला पब्लिश हो जाता है और न्यायिक प्रणाली का हिस्सा बन जाता है तो वह सभी के लिए उपलब्ध होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि फैसले को केवल वही जज मास्क कर सकता है, जिसने उसे सुनाया था, कोई और नहीं। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि किसी भी तरह से अदालती रिकॉर्ड तक पहुँच को रोका नहीं जा सकता।

    दातार ने यह भी कहा कि सिंगल जज का यह तर्क कि किसी फैसले के मकसद और उसके असर जैसी बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, गलत है क्योंकि यह पूरी तरह से व्यक्तिपरक (subjective) मामला है।

    उन्होंने कहा,

    "उदाहरण के लिए 2G स्कैम को ही लें। सालों जेल में रहने के बाद आरोपी बरी हो गए। क्या आप कह सकते हैं कि 2G स्कैम से जुड़े सभी रिकॉर्ड हटा दिए जाएं? यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है। उस (रिकॉर्ड) को मिटाया नहीं जा सकता, क्योंकि वह न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुका है।"

    उन्होंने आगे कहा,

    "अगर किसी वकील को अदालत की अवमानना ​​(Contempt) के लिए दोषी ठहराया जाता है। बाद में सुप्रीम कोर्ट उसे बरी कर देता है तो क्या वह कह सकता है कि मेरा नाम या फैसला हटा दिया जाए? नहीं। आपको दोषी ठहराया गया, तो आप दोषी ठहराए गए। बाद में आप बरी हो गए। यह एक ऐसा रिकॉर्ड है जिसे बिल्कुल भी मिटाया नहीं जा सकता।"

    इस पर बेंच ने टिप्पणी की,

    "सिंगल जज ने यह नहीं कहा है कि इस व्यक्ति के रिकॉर्ड तक पहुंच (Access) बिल्कुल न दी जाए। मान लीजिए कोई व्यक्ति बरी हो जाता है तो यह सुनिश्चित किया जाए कि डिस्ट्रिक्ट कोर्ट या हाईकोर्ट के पिछले रिकॉर्ड तक पहुंच न हो। यह एक नजरिया हो सकता है, अगर जज का मानना ​​हो कि जनहित या निजी हित में यह बहुत जरूरी है कि किसी भी चीज़ तक पहुंच न हो। लेकिन यह कहना कि मैं केस नंबर या XYZ से तो पहुंच की इजाज़त दूंगा, पर नाम से सर्च करने पर नहीं - हम बस यही सोच रहे हैं... या तो आप यह नजरिया अपनाएं कि आप पहुंच की इजाज़त ही नहीं देंगे। लेकिन यह कहना कि मैं ABCDE से पहुंच की इजाज़त दूंगा और F से नहीं - क्या अदालत ऐसा कोई नजरिया अपना सकती है?"

    बेंच ने आगे कहा,

    "हमारे पास बहुत सारे मामले हैं। कई मामलों में मास्किंग (जानकारी छिपाना) की बात आती है। उदाहरण के लिए, IP (बौद्धिक संपदा) से जुड़े मुकदमों में ऐसी गोपनीय जानकारी होती है, जिसे छिपाना (Mask) ज़रूरी होता है, या कीमत का खुलासा नहीं किया जाना चाहिए, या समझौतों का खुलासा नहीं किया जाना चाहिए। ये अलग-अलग मामलों में अलग-अलग वादी (Plaintiffs) द्वारा उठाए गए व्यक्तिगत मुद्दे होते हैं। तब अदालत फैसला लेती है। क्या कोई व्यक्ति अदालत जाकर यह कह सकता है कि ऐसी गाइडलाइंस बनाई जाएं, जिनका पालन किया जाए? मान लीजिए गाइडलाइंस बना भी दी गईं। तो वे किसी दूसरी अदालत पर कैसे बाध्यकारी (Binding) होंगी? ज़्यादा से ज़्यादा, निचली अदालत (Subordinate Court) ही उनका पालन करने के लिए बाध्य होगी।"

    दातार ने जवाब देते हुए कहा कि एक बार जब कोई निर्णय न्यायिक सूचना प्रणाली में डाल दिया जाता है, तो "कोई भी इसे छू नहीं सकता है।"

    उन्होंने अपनी दलीलें ख़त्म करते हुए कहा,

    "कोई भी किसी भी न्यायिक रिकॉर्ड को डीइंडेक्सिंग या छुपा नहीं सकता।"

    मामले की सुनवाई अब 16 सितंबर को होगी, जब सीनियर एडवोकेट अखिल सिब्बल एक अपील में प्रतिवादी के लिए अपनी दलीलें पेश करेंगे।

    सिंगल जज ने 29 मई को दिए गए अपने फैसले में खोज इंजनों और कानूनी डेटाबेस प्लेटफार्मों को याचिकाओं में शामिल निर्णयों, आदेशों और समाचार लेखों के संबंध में नाम-आधारित खोज कार्यक्षमता को डी-इंडेक्स और अक्षम करने का निर्देश दिया।

    यह मानते हुए कि भुला दिए जाने का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सूचनात्मक गोपनीयता का संवैधानिक रूप से संरक्षित पहलू है, सिंगल जज ने ऑनलाइन उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड से व्यक्तिगत जानकारी को डी-इंडेक्सिंग और मास्किंग को नियंत्रित करने वाली रूपरेखा निर्धारित की।

    इंडियन कानून ने अपील में तर्क दिया है कि यह निर्देश "अतिश्योक्तिपूर्ण" है और खुले न्याय और सूचना के अधिकार के संवैधानिक मूल्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

    अपील में कहा गया कि एक बार जब जानकारी सार्वजनिक अदालत के रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाती है तो यौन अपराध के मामलों, किशोर मामलों और अन्य संरक्षित कार्यवाहियों जैसे मान्यता प्राप्त वैधानिक या न्यायिक अपवादों को छोड़कर गोपनीयता का अधिकार आम तौर पर उन रिकॉर्डों पर जीवित नहीं रहता है।

    अपील में यह भी कहा गया कि नाम-आधारित खोजें कानूनी अनुसंधान का अभिन्न अंग हैं और उदाहरणों का पता लगाने के लिए वकीलों, वादियों, शोधकर्ताओं, छात्रों और यहां तक ​​​​कि न्यायाधीशों द्वारा व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। उसका तर्क है कि ऐसी खोजों को प्रतिबंधित करने से उसके व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत व्यापार करने की उसकी स्वतंत्रता का उल्लंघन होता है।

    Title: IKANOON SOFTWARE DEVELOPMENT PVT LTD v. X & ORS & other connected matters

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