NDTV के फाउंडर्स राधिका रॉय और प्रणय रॉय के खिलाफ बार-बार IT रीअसेसमेंट उत्पीड़न के बराबर: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
20 Jan 2026 10:13 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि NDTV के फाउंडर्स राधिका रॉय और प्रणय रॉय के खिलाफ एक ही साल के लिए इनकम टैक्स असेसमेंट को बार-बार खोलना उनके "गैर-ज़रूरी उत्पीड़न" के बराबर है।
जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस विनोद कुमार की डिवीजन बेंच ने यह बात असेसमेंट ईयर 2009-10 के लिए इनकम टैक्स डिपार्टमेंट द्वारा शुरू की गई रीअसेसमेंट कार्यवाही पर सुनवाई करते हुए कही।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा कदम "निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया की जड़ पर ही चोट करता है" और "अराजकता नहीं तो अनिश्चितता/अस्थिरता" पैदा करता है।
यह मामला रॉय दंपत्ति के 2009-10 के इनकम टैक्स रिटर्न से जुड़ा है। दोनों RRPR होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड में 50 प्रतिशत शेयरहोल्डर और डायरेक्टर थे। उन्होंने लगभग 1.66 करोड़ रुपये की इनकम घोषित की थी, जिसे डिपार्टमेंट ने स्वीकार कर लिया।
2011 में डिपार्टमेंट ने असेसमेंट को फिर से खोला, जिसमें NDTV के शेयरों से जुड़े ट्रांजैक्शन और RRPR से मिले ब्याज़-मुक्त लोन पर सवाल उठाए गए।
उन कार्यवाहियों के दौरान, असेसिंग ऑफिसर ने RRPR के अकाउंट्स की किताबें मंगवाईं, लोन ट्रांजैक्शन की विस्तार से जांच की और रॉय दंपत्ति से स्पष्टीकरण मांगा। रीअसेसमेंट मार्च, 2013 में लोन के मुद्दे पर कोई बढ़ोतरी किए बिना पूरा हो गया।
लगभग तीन साल बाद डिपार्टमेंट ने उसी असेसमेंट ईयर के लिए नए नोटिस जारी किए। इस बार इनकम टैक्स एक्ट के एक और प्रावधान का इस्तेमाल करके उन्हीं ब्याज़-मुक्त लोन पर काल्पनिक ब्याज़ पर टैक्स लगाने का प्रस्ताव दिया।
रॉय दंपत्ति की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट सचित्र जॉली ने तर्क दिया कि इस मुद्दे की जांच पहले ही की जा चुकी है। उसी ट्रांजैक्शन पर असेसमेंट को फिर से खोलना सिर्फ़ राय में बदलाव है, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता है।
इसे स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि डिपार्टमेंट किसी तय असेसमेंट को सिर्फ़ इसलिए बार-बार नहीं खोल सकता, क्योंकि वह उसी ट्रांजैक्शन को अलग नज़रिए से देखना चाहता है।
बेंच ने कहा,
"प्रतिवादी 1961 के एक्ट की धारा 147/148 के तहत कार्यवाही को फिर से शुरू नहीं कर सकते।"
कोर्ट ने डिपार्टमेंट के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि रॉय दंपत्ति द्वारा ज़रूरी तथ्यों का खुलासा न करने के आरोप के कारण छह साल की बढ़ी हुई समय सीमा लागू होती है। इसमें कहा गया कि ऑडिट किए गए अकाउंट्स की किताबें, बैलेंस शीट और बिना ब्याज वाले लोन की डिटेल्स पहले के री-असेसमेंट के दौरान पहले से ही रिकॉर्ड में थीं।
बेंच ने कहा, "यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता ने असेसिंग ऑफिसर के सामने सही और ज़रूरी तथ्य नहीं बताए," और यह माना कि लिमिटेशन की बढ़ी हुई अवधि का इस्तेमाल करना "पूरी तरह से बेबुनियाद" था और री-असेसमेंट को "मौलिक रूप से और स्वाभाविक रूप से अधिकार क्षेत्र से बाहर" कर देता है।
दूसरे री-ओपनिंग को मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए कोर्ट ने कहा कि यह संविधान के आर्टिकल 14, 19(1)(g) और 300A के तहत रॉय के अधिकारों का उल्लंघन करता है।
कोर्ट ने कहा,
"इस मामले में याचिकाकर्ता को उसी ट्रांजैक्शन और लगभग उसी मुद्दे के लिए दूसरी बार री-असेसमेंट की कार्यवाही के अधीन करना मनमाना और अधिकार क्षेत्र से बाहर है। यह भारत के संविधान के आर्टिकल 14, आर्टिकल 19(1)(g) और आर्टिकल 300A के तहत याचिकाकर्ता के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।"
हाईकोर्ट ने री-असेसमेंट नोटिस को रद्द कर दिया और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट पर राधिका रॉय और प्रणय रॉय को देने के लिए 1 लाख रुपये का टोकन जुर्माना लगाया।
Case Title: Radhika Roy v. Deputy Commissioner of Income Tax

