स्पेशल जज को POCSO अपराध न मिलने पर FIR की अर्जी मजिस्ट्रेट को भेजनी होगी या नहीं? दिल्ली हाईकोर्ट करेगा फैसला

  • स्पेशल जज को POCSO अपराध न मिलने पर FIR की अर्जी मजिस्ट्रेट को भेजनी होगी या नहीं? दिल्ली हाईकोर्ट करेगा फैसला

    दिल्ली हाईकोर्ट यह तय करेगा कि जब किसी विशेष कानून के तहत गठित स्पेशल कोर्ट प्रथमदृष्टया यह पाती है कि उस कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता, तो क्या FIR दर्ज करने की मांग वाली BNSS की धारा 175(3) के तहत दायर अर्जी संबंधित मजिस्ट्रेट को भेजना जरूरी है या नहीं।

    जस्टिस गिरीश कथपालिया ने दिल्ली और हरियाणा के कई पुलिस अधिकारियों की ओर से दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह कानूनी सवाल उठाया। याचिकाओं में POCSO Act के स्पेशल जज द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें संबंधित DCP को भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की प्रासंगिक धाराओं के तहत पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया।

    मामला दिल्ली के बदरपुर इलाके की महिला के घर पुलिस अधिकारियों के पहुंचने से जुड़ा है। पुलिसकर्मी उसके बेटे को पकड़ने गए थे जो कथित तौर पर कई आपराधिक मामलों में शामिल था। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, महिला ने गिरफ्तारी का विरोध किया और उन्हें अपनी पोतियों की शिकायत के जरिए झूठे POCSO मामलों में फंसाने की धमकी दी।

    पुलिस अधिकारियों ने दावा किया कि पूरी घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग हुई। इसके बाद महिला को GD एंट्री दर्ज कराने के लिए थाना जैतपुर ले जाया गया और फिर पूछताछ के लिए महिला थाना, सेक्टर-16, फरीदाबाद ले जाया गया।

    इसके बाद महिला ने POCSO Act के स्पेशल जज के समक्ष BNSS की धारा 175(3) के तहत अर्जी दाखिल कर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की। स्पेशल जज ने उसकी अर्जी स्वीकार करते हुए FIR दर्ज करने का निर्देश दिया।

    पुलिस अधिकारियों की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि स्पेशल जज ने CCTV फुटेज और उपलब्ध वीडियो रिकॉर्डिंग देखने के बाद प्रथमदृष्टया यह निष्कर्ष दर्ज किया कि उनके खिलाफ POCSO Act के तहत कोई अपराध नहीं बनता। ऐसे में जब स्पेशल जज खुद यह निष्कर्ष निकाल चुके थे कि POCSO अपराध नहीं बनता, तो FIR की अर्जी संबंधित मजिस्ट्रेट को भेजी जानी चाहिए थी। स्पेशल जज को स्वयं FIR दर्ज करने का निर्देश देने का अधिकार नहीं था।

    महिला की ओर से इस दलील का विरोध करते हुए कहा गया कि POCSO अपराध नहीं बनने का निष्कर्ष केवल प्रथमदृष्टया था और इससे स्थानीय पुलिस के पास उपलब्ध अन्य सामग्री के आधार पर FIR दर्ज करने की शक्ति खत्म नहीं होती। दलील दी गई कि BNSS की धारा 175(3) को BNS की धाराओं 173 और 199 के साथ पढ़ने पर आवश्यक परिस्थितियों में बिना प्रारंभिक जांच के FIR दर्ज करना अनिवार्य है।

    जस्टिस कथपालिया ने अपने आदेश में विशेष रूप से कहा कि विवादित आदेश के ऑपरेटिव हिस्से में केवल किसी कानून के तहत FIR दर्ज करने का सामान्य निर्देश नहीं दिया गया, बल्कि BNS की संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया।

    इसके बाद हाईकोर्ट ने कानूनी सवाल तय किया कि यदि किसी कानून के तहत गठित स्पेशल जज यह निष्कर्ष निकालता है कि उस विशेष कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता, तो क्या उसे BNSS की धारा 175(3) के तहत दाखिल FIR की अर्जी संबंधित मजिस्ट्रेट को भेजनी चाहिए या नहीं।

    कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों को इस सवाल पर अपनी दलीलें रखनी होंगी। फिलहाल हाईकोर्ट ने विवादित आदेश के संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक लगाई।

    मामले की अगली सुनवाई 18 दिसंबर को होगी।

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