रेप सिर्फ़ शारीरिक शोषण नहीं, यह पीड़ित की "आत्मा" का भी उल्लंघन हो सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट

  • रेप सिर्फ़ शारीरिक शोषण नहीं, यह पीड़ित की आत्मा का भी उल्लंघन हो सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि रेप सिर्फ़ शारीरिक शोषण नहीं है, बल्कि यह पीड़ित की "आत्मा" का भी उल्लंघन हो सकता है, क्योंकि इसका सदमा शारीरिक सीमाओं से आगे बढ़कर मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्तर तक पहुंच जाता है।

    जस्टिस विमल कुमार यादव ने यह टिप्पणी 2006 में एक महिला के साथ रेप के आरोपी व्यक्ति को बरी किए जाने के खिलाफ़ राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए की।

    कोर्ट ने कहा कि रेप सर्वाइवर्स को सामाजिक बदनामी और बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि समाज कभी-कभी सहानुभूति, समर्थन और संवेदना दिखाने के बजाय पीड़ित को ही दोषी ठहराता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "कुछ समाजों और इलाकों में सामाजिक बदनामी और बहिष्कार का आलम यह है कि दुर्भाग्य से पीड़ित को ही उस घटना के लिए दोषी ठहराया जाता है, जो उसके साथ हुई।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि जब परिवार, मेडिकल, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समर्थन नहीं मिलता तो पीड़ित की ज़िंदगी सचमुच "जीते-जी नर्क" बन सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कभी-कभी पीड़ित को कानूनी मदद लेने के बजाय अपनी जान देना आसान लग सकता है।

    कोर्ट के सामने आए मामले में युवा महिला के साथ उसके पड़ोसी ने कथित तौर पर तब रेप किया, जब वह अपनी झुग्गी में अकेली थी। बाद में उसने अपने भाई को बताया और पुलिस को मामले की सूचना दी गई। हालाँकि, घटना के लगभग तीन महीने बाद और कोर्ट में गवाही देने से पहले ही, पीड़ित ने आत्महत्या कर ली।

    कोर्ट ने पाया कि पीड़ित द्वारा छोड़े गए सुसाइड नोट से पता चलता है कि उसने घटना के बाद शर्मिंदगी के कारण यह कठोर कदम उठाया।

    राज्य सरकार ने आरोपी को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। सरकार का तर्क था कि CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज पीड़ित का बयान, FIR का आधार बना उसका बयान, मेडिकल सबूत और सुसाइड नोट - इन सभी पर एक साथ विचार किया जाना चाहिए।

    हालांकि, कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में कोई सीधा सबूत नहीं था, क्योंकि गवाही देने से पहले ही पीड़ित की मौत हो चुकी। कोर्ट ने माना कि CrPC की धारा 164 के तहत बयान की भूमिका सीमित होती है - यानी इसका इस्तेमाल विरोधाभास या पुष्टि के लिए किया जा सकता है, लेकिन यह ठोस सबूत की जगह नहीं ले सकता। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद जानकारी से इस बात की "बहुत मज़बूत संभावना" पता चलती है कि पीड़िता के साथ रेप हुआ। हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि "संभावना, चाहे कितनी भी मज़बूत क्यों न हो, उसे सबूत की जगह नहीं दी जा सकती।"

    कोर्ट ने यह भी गौर किया कि मेडिकल जांच में चोट के निशान और हाइमन फटे होने की बात दर्ज की गई। अगर पीड़िता गवाही दे पाती और जिरह का सामना कर पाती तो ये बातें उसके मुख्य बयान की पुष्टि कर सकती थीं।

    इसलिए कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को सही तरीके से बरी किया और राज्य की अपील खारिज की।

    Case Title : State v. Om Parkash @ Kallu

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