RTI के तहत कर्मचारी की LTC और CGHS रीइम्बर्समेंट के लिए सरकारी पैसे का इस्तेमाल होने से उनकी निजी जानकारी का खुलासा करना ज़रूरी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
9 Oct 2026 9:46 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि किसी सरकारी कर्मचारी को मिलने वाले कुछ फ़ायदों में सरकारी पैसे का खर्च शामिल है, इसका मतलब यह नहीं है कि उनसे जुड़ी निजी जानकारी को 'सूचना का अधिकार' (RTI) कानून के तहत सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
जस्टिस अमित महाजन ने यह बात याचिका खारिज करते हुए कही। यह याचिका 'केंद्रीय सूचना आयोग' (CIC) के उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई, जिसमें 'नागरिक उड्डयन महानिदेशालय' (DGCA) के एक कर्मचारी से जुड़ी निजी जानकारी का खुलासा करने से इनकार किया गया।
याचिकाकर्ता ने कर्मचारी की 'लीव ट्रैवल कंसेशन' (LTC) से जुड़ी जानकारी मांगी। इसमें उनके आश्रितों के लिए बुक किए गए टिकट, LTC सेटलमेंट फ़ॉर्म, आश्रितों द्वारा ली गई CGHS मेडिकल सुविधाओं का विवरण, मेडिकल बिल, परिवार घोषणा फ़ॉर्म और आश्रितों के साथ की गई अन्य LTC यात्राओं का विवरण शामिल था।
DGCA के 'केंद्रीय जन सूचना अधिकारी' (CPIO) ने RTI कानून की धारा 8(1)(j) के तहत इस अनुरोध को खारिज किया। यह धारा कुछ निजी जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट देती है।
पहली अपीलीय अथॉरिटी ने इस फ़ैसले को सही ठहराया, जिसके बाद CIC ने भी याचिकाकर्ता की दूसरी अपील खारिज की।
CIC ने अपने आदेश में कहा कि यह जानकारी 'थर्ड-पार्टी' (किसी तीसरे पक्ष) की निजी जानकारी है और इसे सार्वजनिक करने के लिए कोई बड़ा जनहित साबित नहीं हुआ।
हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि चूंकि यह जानकारी LTC और CGHS फ़ायदों से जुड़ी है जिनमें सरकारी पैसा खर्च होता है, इसलिए इसे बड़े जनहित में सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि सूचना का अधिकार कोई असीमित अधिकार नहीं है। धारा 8(1)(j) निजी जानकारी की सुरक्षा करती है, जब उसका खुलासा किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से जुड़ा न हो, या जिससे निजता का अनावश्यक उल्लंघन हो, बशर्ते कि बड़े जनहित में इसका खुलासा करना ज़रूरी न हो।
कोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ता सिर्फ़ LTC या मेडिकल रीइम्बर्समेंट पर DGCA द्वारा किए गए कुल खर्च का आंकड़ा नहीं मांग रहा था।
इसके बजाय, कोर्ट ने कहा कि मांगी गई जानकारी परिवार के पहचाने जा सकने वाले सदस्यों, उनकी यात्रा, मेडिकल इलाज, मेडिकल खर्च और कर्मचारी द्वारा अपने आश्रितों के संबंध में दी गई पारिवारिक घोषणाओं से जुड़ी थी।
कोर्ट ने कहा,
"ऐसी जानकारी, अपनी प्रकृति से ही, संबंधित कर्मचारी और उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण, उसके परिवार के सदस्यों (जो तीसरे पक्ष हैं) के निजी मामलों से जुड़ी होती है।"
कोर्ट ने कहा,
"इसके अलावा, सिर्फ़ यह कहना कि संबंधित फ़ायदों में सरकारी पैसे का खर्च शामिल हो सकता है, अपने आप में उस निजी जानकारी को सार्वजनिक करने का आधार नहीं बन सकता; खासकर तब, जब याचिकाकर्ता ने ऐसा कोई बड़ा जनहित नहीं दिखाया हो जो संबंधित कर्मचारी और उसके परिवार के सदस्यों की निजी जानकारी को सार्वजनिक करने को ज़रूरी बनाता हो।"
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को भी खारिज किया कि जानकारी विजिलेंस शिकायतों पर आगे बढ़ने के लिए मांगी गई। कोर्ट ने माना कि इससे जानकारी पाने का कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं बनता, जो RTI एक्ट के तहत सार्वजनिक करने से छूट प्राप्त है।
अधिकारियों ने यह भी बताया था कि याचिकाकर्ता की शादी संबंधित DGCA कर्मचारी की बहन से हुई और दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक विवाद पैदा हो गए, जिसके चलते तलाक की कार्यवाही शुरू हो चुकी थी।
इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने कहा कि RTI सिस्टम को "निजी हिसाब-किताब बराबर करने" या वैवाहिक विवादों से जुड़ी शिकायतों को आगे बढ़ाने का ज़रिया नहीं बनने दिया जा सकता, खासकर तब जब मांगी गई जानकारी किसी तीसरे पक्ष के निजी मामलों से संबंधित हो।
इसके अनुसार, कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और मांगी गई जानकारी न देने के फ़ैसले को सही ठहराया।
Case Title : SACHIN KUMAR DAKSH v. DIRECTOR-ADMIN AND FINANCE & ANR

