प्राइवेट स्कूलों को शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में फीस बढ़ाने के लिए पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

Shahadat

26 May 2026 10:30 AM IST

  • प्राइवेट स्कूलों को शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में फीस बढ़ाने के लिए पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि प्राइवेट, गैर-सरकारी मदद वाले (Unaided) स्कूलों को शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में फीस बढ़ाने के लिए शिक्षा निदेशालय (DoE) से पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं है, बशर्ते उन्होंने दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम की धारा 17(3) के तहत DoE के पास अपनी फीस का ब्योरा जमा कर दिया हो।

    अपने 120 पन्नों के फ़ैसले में कोर्ट ने कहा कि पहले से मंज़ूरी तभी ज़रूरी होगी, जब कोई स्कूल चल रहे शैक्षणिक सत्र के दौरान, सत्र शुरू होने से पहले घोषित फीस के ढांचे से ज़्यादा फीस बढ़ाना चाहे।

    कोर्ट ने कहा,

    "DSE Act की धारा 17(3) के तहत, किसी प्राइवेट, गैर-सरकारी मदद वाले, मान्यता प्राप्त स्कूल को शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में अपनी फीस बढ़ाने के लिए पहले से किसी अनुमति या मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं होती। स्कूल पर एकमात्र कानूनी ज़िम्मेदारी यह है कि उसे शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले DoE के पास अपनी प्रस्तावित फीस का ब्योरा जमा करना होगा। हालांकि, DSE Act की धारा 17(3) के तहत किसी प्राइवेट, गैर-सरकारी मदद वाले, मान्यता प्राप्त स्कूल को DoE की पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत होगी, अगर स्कूल चल रहे शैक्षणिक सत्र के दौरान फीस में बढ़ोतरी लागू करने का प्रस्ताव रखता है।"

    जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने यह टिप्पणी कई प्राइवेट, गैर-सरकारी मदद वाले, मान्यता प्राप्त स्कूलों द्वारा दायर याचिकाओं के एक समूह पर फ़ैसला सुनाते हुए की। इन याचिकाओं में स्कूलों ने DoE द्वारा उनके फीस बढ़ोतरी के प्रस्तावों को खारिज किए जाने और फीस तय करने वाले उसके नियामक ढांचे को चुनौती दी थी।

    कोर्ट ने टिप्पणी की कि DoE की भूमिका केवल "व्यावसायीकरण" और "मुनाफ़ाखोरी" को रोकने तक सीमित है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत स्कूलों को वित्तीय और प्रशासनिक मामलों में काफ़ी हद तक स्वायत्तता (आज़ादी) मिली हुई है।

    कोर्ट ने साफ़ किया,

    “सिद्धांत रूप में, DoE के पास किसी स्कूल पर फीस बढ़ाने से जुड़ा कोई फ़ैसला थोपने की शक्ति है… हालांकि, DoE इस शक्ति का इस्तेमाल तभी कर सकता है – और यह एक गंभीर शर्त है – जब DoE पहले यह तय कर ले कि स्कूल ने DSE Act की धारा 18(5) के तहत तय अथॉरिटी द्वारा किए गए ऑडिट के आधार पर मुनाफ़ाखोरी या व्यावसायीकरण किया, न कि उस समय किसी अनुमान के आधार पर, जब स्कूल DSE Act की धारा 17(3) के तहत आने वाले एकेडमिक सेशन के लिए अपनी फीस का ब्योरा जमा करता है।”

    कोर्ट ने आगे कहा,

    “चूंकि DoE के नॉमिनी हर प्राइवेट, गैर-सरकारी मदद वाले, मान्यता प्राप्त स्कूल की मैनेजिंग कमिटी में बैठते हैं। मैनेजिंग कमिटी द्वारा लिए गए फ़ैसलों में उनकी भी राय होती है, इसलिए मैनेजिंग कमिटी द्वारा सर्वसम्मति से या नॉमिनी की सहमति से लिए गए फीस बढ़ाने के फ़ैसले का आम तौर पर सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि यह उम्मीद की जाती है कि मैनेजिंग कमिटी में DoE के प्रतिनिधियों ने इस पर अच्छी तरह सोच-विचार किया होगा और अपनी सहमति दी होगी।”

    कोर्ट ने आगे DoE और स्कूलों, दोनों के लिए कुछ समय-सीमाएं तय कीं, जिनका पालन उन्हें तब करना होगा, जब स्कूल चल रहे एकेडमिक सेशन के दौरान अपनी फीस बढ़ाने का प्रस्ताव रखता है:

    (i) स्कूल को फीस बढ़ाने का अपना प्रस्ताव, उस तारीख से कम से कम 02 महीने पहले जमा करना होगा, जिस तारीख से स्कूल फीस बढ़ाना लागू करना चाहता है।

    (ii) DoE को फीस बढ़ाने के प्रस्ताव पर उन 02 महीनों के अंदर फ़ैसला लेना होगा; अगर वह ऐसा नहीं करता है तो फीस बढ़ाने के प्रस्ताव को मंज़ूर मान लिया जाएगा।

    हालांकि, मौजूदा मामले में कोर्ट ने कहा कि DoE का रवैया “कानून में तय नियमों का पालन करने से साफ़ इनकार” जैसा था, जबकि इस मुद्दे पर पहले से ही कई फ़ैसले (Precedents) मौजूद हैं।

    कोर्ट ने 'दिल्ली अभिभावक महासंघ बनाम भारत संघ (1998)' मामले का ज़िक्र करते हुए कहा कि धारा 17(3) स्कूल के लिए एक उचित फीस ढांचा तय करने के अधिकार और DoE की रेगुलेटरी शक्तियों के बीच संतुलन बनाती है। इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि विभिन्न स्कूलों द्वारा DoE के पास जमा किए गए अपने-अपने फीस विवरणों में पिछली बार प्रस्तावित फीस वृद्धि लागू होगी, लेकिन यह केवल अप्रैल 2027 से शुरू होने वाले अगले शैक्षणिक सत्र से ही लागू होगी। कोई भी स्कूल किसी भी अभिभावक या छात्र से पिछले शैक्षणिक सत्रों के लिए फीस या अन्य शुल्कों का कोई भी बकाया पिछली तारीख से न तो मांगेगा और न ही वसूल करेगा।

    Case title: DPS Vasant Kunj & Ors. v. GNCTD (and batch)

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