हम कैसे निगरानी करेंगे? बेघर और तोड़फोड़ से विस्थापित लोगों को SIR में शामिल करने की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
Amir Ahmad
19 Aug 2026 3:24 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान बेघर लोगों और तोड़फोड़ अभियान के कारण विस्थापित हुए लोगों को मतदाता सूची में शामिल करने की मांग वाली जनहित याचिका पर बुधवार को फैसला सुरक्षित रख लिया।
अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि हर जिम्मेदारी अदालत पर नहीं डाली जा सकती और वह नीति के क्रियान्वयन की निगरानी नहीं करेगी।
चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने कहा कि संबंधित संवैधानिक संस्थाओं को अपने संवैधानिक दायरे में इस समस्या का समाधान करने के लिए व्यवस्था विकसित करनी होगी।
याचिका इंदु प्रकाश सिंह ने दायर की। इसमें मांग की गई है कि ऐसे लोगों के लिए विशेष सहायता व्यवस्था बनाई जाए, ताकि स्थायी पता नहीं होने के कारण उनका नाम मतदाता सूची से बाहर न हो।
याचिका में बेघर लोगों के नाम दर्ज करने, एक स्थान से दूसरे स्थान पर नाम स्थानांतरित करने और मतदाता सूची में नाम बनाए रखने के लिए सुविधाजनक प्रक्रिया तैयार करने की मांग की गई।
याचिका के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया जा रहा है। ऐसे में उन लोगों के सामने विशेष कठिनाई पैदा हो सकती है, जो बेघर हो चुके हैं या जिनके मकान तोड़फोड़ अभियान में ध्वस्त कर दिए गए।
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट सत्यकाम ने कहा कि ऐसे लोग मतदाता सूची में दर्ज पुराने पते पर अब उपलब्ध नहीं हो सकते। जिन लोगों के मकान तोड़े जा चुके हैं, उन्हें निवास का प्रमाण देने और पुनरीक्षण प्रक्रिया तक पहुंचने में भी परेशानी हो सकती है।
उन्होंने कहा कि 10 जुलाई को अधिकारियों को इस संबंध में अभ्यावेदन दिया गया, जिसे 13 जुलाई को स्वीकार भी किया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर समस्याओं के समाधान के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।
इस पर अदालत ने कहा,
“हर चीज अदालत पर नहीं थोपी जा सकती। हम नीति के क्रियान्वयन की निगरानी नहीं करेंगे।”
पीठ ने यह भी कहा कि याचिका में व्यवस्था को बेहतर बनाने के सुझाव दिए गए, लेकिन यह संबंधित अधिकारियों को तय करना है कि संवैधानिक दायरे में इस प्रक्रिया को किस तरह अधिक प्रभावी बनाया जाए।
अदालत ने कहा,
“उनके पास संवैधानिक ढांचे के भीतर काम करने के लिए संवैधानिक जिम्मेदारियां हैं। उन्हें अपने तंत्र के माध्यम से इस पर विचार करना है।”
निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि बेघर लोगों से जुड़ी समस्या को ध्यान में रखते हुए उचित व्यवस्था और कदम पहले से उठाए गए।
उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को नाम दर्ज कराने के लिए निर्धारित प्रपत्र भरना होगा और आश्रय गृह में रहने का प्रमाण देना होगा।
आयोग की ओर से कहा गया कि जिन लोगों का कोई स्पष्ट पता नहीं है, उनके लिए भी व्यवस्था मौजूद है। बूथ स्तर के अधिकारी ऐसे लोगों का पता लगाने और उनकी जानकारी का सत्यापन करने के लिए बाध्य हैं।
आयोग ने अदालत को बताया कि बेघर लोगों की समस्या को विशेष गहन पुनरीक्षण की शुरुआत से ही ध्यान में रखा गया और व्यवस्था के तहत ऐसे लोगों को शामिल किया जा रहा है।
हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश दलीलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि याचिका में प्रभावित लोगों की निश्चित संख्या या ऐसे व्यक्तियों के नाम नहीं दिए गए, जिन्हें पुनरीक्षण प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया हो।
पीठ ने कहा,
“जब मामला धारणा पर आधारित हो तो अदालत के लिए उसकी सुनवाई करना कठिन हो जाता है। यदि नीति के क्रियान्वयन में कोई कमी है तो यह बताना होगा कि इतने लोगों को बाहर रखा गया।”
अदालत ने यह भी पूछा कि यदि किसी नीति और उसकी प्रक्रिया को लागू करने में कमी का आरोप लगाया जाता है तो क्या अदालत उसके हर स्तर की निगरानी कर सकती है।
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि अतीत में करीब 650 लोगों को मताधिकार से वंचित किया गया और इस बार भी बड़ी संख्या में लोगों के बाहर होने की आशंका है। उन्होंने कहा कि इसी आशंका को देखते हुए याचिका दायर की गई।
इस पर अदालत ने टिप्पणी की,
“हर चीज अदालत पर नहीं थोपी जानी चाहिए। ऐसा नहीं है कि हमें चिंताओं की परवाह नहीं है।”
अंत में याचिकाकर्ता की ओर से अनुरोध किया गया कि अधिकारियों को दिए गए अभ्यावेदन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया जाए और उन्हें कानून के अनुसार आगे उचित कदम उठाने की स्वतंत्रता दी जाए। अदालत ने कहा कि इस संबंध में उचित आदेश पारित किया जाएगा।
याचिका में दावा किया गया कि तोड़फोड़ अभियानों के कारण बेघर या विस्थापित हुए तीन लाख से अधिक लोग विशेष गहन पुनरीक्षण से प्रभावित हो सकते हैं।
याचिका में यह भी कहा गया कि दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने तोड़फोड़ के कारण विस्थापित लोगों को विशेष मामले माना, जिनसे अलग तरीके से निपटने की बात कही गई।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि इसके बाद ऐसे लोगों को पुनरीक्षण प्रक्रिया में शामिल करने के लिए कोई औपचारिक नीति, अधिसूचना या प्रशासनिक व्यवस्था नहीं बनाई गई।
याचिका में आशंका जताई गई कि इससे पात्र मतदाताओं का अप्रत्यक्ष रूप से नाम कट सकता है।
याचिका में बेघर और तोड़फोड़ से प्रभावित लोगों की पहचान कर उनका पुनरीक्षण करने, आवश्यक दस्तावेजों से जुड़ी प्रक्रिया में राहत देने, बूथ स्तर के अधिकारियों के जरिए क्षेत्रीय सत्यापन कराने और विशेष नामांकन शिविर लगाने की मांग की गई।
इसके अलावा ऐसे मतदाताओं की सहायता और शिकायतों के समाधान के लिए अलग व्यवस्था बनाने की भी मांग की गई।


