सिर्फ़ समझौते के आधार पर मुख्य अपराध रद्द होने से PMLA केस खत्म नहीं हो सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
11 Aug 2026 10:50 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत मनी लॉन्ड्रिंग का केस तब भी चल सकता है, जब मुख्य अपराध (प्रेडिकेट ऑफ़ेंस) को समझौते के आधार पर रद्द कर दिया गया हो। कोर्ट ने कहा कि ऐसे समझौते का मतलब यह नहीं है कि न्यायिक रूप से यह साबित हो गया है कि वह अपराध कभी हुआ ही नहीं था।
जस्टिस पुरषेंद्र कुमार कौरव ने यह टिप्पणी तब की, जब वे मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क से जुड़े एक आरोपी की ज़मानत अर्जी खारिज कर रहे थे। यह नेटवर्क कथित तौर पर धोखाधड़ी वाले निवेश एप्लीकेशन और विदेशी मुद्रा (फॉरेक्स) लेनदेन से जुड़ा था।
कोर्ट ने कहा कि अगर मुख्य अपराध को इस न्यायिक निष्कर्ष के साथ रद्द किया जाता है कि अपराध कभी हुआ ही नहीं था तो PMLA केस का आधार ही खत्म हो जाएगा, क्योंकि अपराध से कोई कमाई (प्रोसीड्स ऑफ़ क्राइम) नहीं हुई होगी। हालांकि, स्थिति तब अलग होती है जब मुख्य अपराध को सिर्फ़ समझौते के आधार पर रद्द किया जाता है।
कोर्ट ने कहा,
"जब मुख्य अपराध को समझौते/सहमति के आधार पर रद्द किया जाता है तो अपराध से हुई कमाई के अस्तित्व पर कोई निष्कर्ष नहीं निकलता। मुख्य अपराध के अस्तित्व पर न्यायिक विचार होने से पहले ही कार्यवाही रुक जाती है। ऐसे मामले में सीधे तौर पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अपराध से कोई कमाई कभी हुई ही नहीं थी।"
कोर्ट ने आगे चेतावनी दी कि अगर इसके उलट स्थिति को माना जाए तो आरोपी शिकायतकर्ता के साथ मूल आपराधिक मामले का समझौता करके मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही को नाकाम कर सकते हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"अगर ऐसा होता है तो चालाक मनी लॉन्ड्रर्स मुख्य अपराध में शिकायतकर्ताओं के साथ अपने मामले सुलझाकर सभी PMLA कार्यवाहियों को नाकाम कर सकते हैं।"
कोर्ट ने आगे कहा कि मुख्य अपराध का रद्द होना ज़्यादा से ज़्यादा सिर्फ़ उस खास शिकायतकर्ता के मामले में ही लागू हो सकता है।
कोर्ट ने कहा,
"मनी लॉन्ड्रिंग अपराध के संबंध में ED की जांच - यानी 'शेड्यूल्ड ऑफ़ेंस' (सूचीबद्ध अपराध) से जुड़ी आपराधिक गतिविधि से हासिल या प्राप्त संपत्ति पर की गई कार्रवाई - शिकायतकर्ता की विशिष्ट शिकायत पर पुलिस द्वारा की गई जांच की तुलना में कहीं ज़्यादा व्यापक दायरे में होती है।"
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि ED ने बाद में ECIR में 24 और FIR शामिल की थीं, जिनमें ज़िनदाई टेक्नोलॉजीज़ (Xindai Technologies) और बेटेंच नेटवर्क्स (Betench Networks) जैसी संस्थाओं और जांच के दायरे में चल रही बड़ी साज़िश से संबंध होने का आरोप लगाया गया।
कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया कि FIR का असर इसलिए नहीं हो सकता, क्योंकि उनमें आवेदक का नाम नहीं था। कोर्ट ने गौर किया कि मूल FIR में भी उसका नाम नहीं था और ED की जांच में ही कथित तौर पर उसकी भूमिका का पता चला था।
इसके आधार पर कोर्ट ने माना कि PMLA की कार्यवाही जारी रहेगी और जमानत की अर्जी खारिज की।
Case title: Rohit Vij v. ED


