लत लगाने वाले सोशल मीडिया डिजाइन पर दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका, विशेषज्ञ समिति बनाने की मांग
Amir Ahmad
9 Sept 2026 6:16 PM IST

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार बढ़ती निर्भरता और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर इसके कथित असर को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई।
याचिका में फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, टेलीग्राम, एक्स और स्नैपचैट जैसे मंचों में इस्तेमाल होने वाले ऐसे डिजाइन की विशेषज्ञ जांच कराने की मांग की गई, जिन्हें यूजर्स का ध्यान अधिक से अधिक समय तक बनाए रखने और बार-बार मंच पर लौटने के लिए तैयार किया गया।
याचिका बुधवार को चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध हुई।
हालांकि, जस्टिस कारिया ने मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। अब मामले को अगले बुधवार को दूसरी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया।
जस्टिस कारिया अपने वकालत के कार्यकाल के दौरान मेटा, जिसे पहले फेसबुक के नाम से जाना जाता था, की ओर से विभिन्न अदालतों में पेश हो चुके हैं।
यह जनहित याचिका कानून के प्रोफेसर डॉ. विकास कथूरिया ने दायर की है। इसमें केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी, महिला एवं बाल विकास, शिक्षा तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालयों के अलावा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और मेटा प्लेटफॉर्म्स, गूगल, स्नैप, एक्स तथा टेलीग्राम को पक्षकार बनाया गया।
याचिका में स्पष्ट किया गया कि याचिकाकर्ता की चिंता सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली सामग्री को लेकर नहीं, बल्कि उसके पीछे इस्तेमाल होने वाले डिजाइन को लेकर है।
उनका आरोप है कि मंचों का ढांचा इस तरह तैयार किया गया है कि उपयोगकर्ता का ध्यान लगातार खींचा जाए, उसे बनाए रखा जाए और बार-बार उसी गतिविधि में लगाया जाए।
याचिका में अनंत स्क्रोल, अपने आप चलने वाले वीडियो, छोटे वीडियो जैसे रील, उपयोगकर्ता की पसंद के अनुसार तैयार की गई सामग्री, लगातार आने वाली सूचनाएं और 'लाइक' जैसे बार-बार मिलने वाले प्रतिक्रिया संकेतों को ऐसे डिजाइन का उदाहरण बताया गया।
याचिकाकर्ता का कहना है कि मौजूदा भारतीय कानून सोशल मीडिया पर अवैध या हानिकारक सामग्री को तो नियंत्रित करते हैं, लेकिन ऐसे डिजाइन को अलग से नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट व्यवस्था नहीं है, जो उपयोगकर्ताओं में लत जैसी निर्भरता पैदा कर सकता है।
याचिका में 15 से 24 वर्ष की आयु के युवाओं के बीच मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं का भी उल्लेख किया गया। इसमें चिंता, अवसाद, आत्मसम्मान में कमी, साइबर उत्पीड़न से पैदा तनाव और लगातार सोशल मीडिया देखने की आदत जैसी समस्याओं को रेखांकित किया गया।
याचिका में दूसरे देशों में सोशल मीडिया के ऐसे डिजाइन को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों का भी हवाला दिया गया।
याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिका का उद्देश्य सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना नहीं है। मांग केवल उन विशेष सुविधाओं के नियमन की है, जिन्हें यूजर्स की भागीदारी और मंच पर बिताया जाने वाला समय बढ़ाने के लिए तैयार किया गया।
याचिका में केंद्र सरकार को विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई। समिति सोशल मीडिया मंचों के ऐसे डिजाइन की जांच कर वैज्ञानिक और प्रमाण आधारित मानक तथा सुरक्षा उपाय सुझाएगी।
इसके अलावा याचिका में अदालत से ऐसे डिजाइन फीचर पर रोक लगाने, उन्हें सीमित करने या उनके नियमन के लिए उचित दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई।
सोशल मीडिया कंपनियों से युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को कथित नुकसान पहुंचाने वाले इन डिजाइन के लिए मुआवजा दिलाने की मांग भी याचिका में की गई।


