लेक्चरर को ज़्यादा सैलरी के लिए PhD की ज़रूरत आर्टिकल 14, 16 का उल्लंघन नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने AICTE के नियमों को सही ठहराया

  • लेक्चरर को ज़्यादा सैलरी के लिए PhD की ज़रूरत आर्टिकल 14, 16 का उल्लंघन नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने AICTE के नियमों को सही ठहराया

    दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकारी पॉलिटेक्निक संस्थानों में लेक्चरर को ₹10,000 का ज़्यादा एकेडमिक ग्रेड पे (AGP) देने के लिए एलिजिबिलिटी शर्त के तौर पर PhD डिग्री को ज़रूरी बनाने के ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) के नियम को सही ठहराया।

    जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने कहा,

    “जिन लेक्चरर के पास PhD क्वालिफिकेशन है और जिनके पास नहीं है, उनके बीच अंतर को मनमाना, भेदभावपूर्ण या भारत के संविधान के आर्टिकल 14 और 16 का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता। सैलरी और करियर में आगे बढ़ने के लिए ज़्यादा एकेडमिक क्वालिफिकेशन तय करना पूरी तरह से AICTE जैसी कानूनी एक्सपर्ट बॉडी के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस कोर्ट के असाधारण रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करके इसमें दखल देने की ज़रूरत नहीं है।”

    कोर्ट ने इस तरह दिल्ली सरकार के तहत काम करने वाले लेक्चरर द्वारा दायर याचिकाओं के एक बैच को खारिज कर दिया, जिन्हें इस बात की शिकायत थी कि उनके जूनियर्स को PhD होने के कारण ₹10,000 का ज़्यादा AGP दिया गया, जबकि वे (जिनके पास PhD क्वालिफिकेशन नहीं थी) ₹9,000 के AGP पर ही बने रहे।

    कोर्ट ने कहा कि हालांकि टेक्निकल संस्थानों में लेक्चरर के तौर पर नियुक्ति के लिए PhD कोई ज़रूरी या अनिवार्य क्वालिफिकेशन नहीं थी, लेकिन AICTE ने बाद में एकेडमिक ग्रेड पे देने के मकसद से PhD वाले और बिना PhD वाले लेक्चरर (सिलेक्शन ग्रेड/ग्रेड-IV) के बीच अंतर शुरू किया।

    कोर्ट ने कहा कि AICTE, एक कानूनी एक्सपर्ट बॉडी के तौर पर टेक्निकल संस्थानों में शिक्षकों के लिए क्वालिफिकेशन, सर्विस की शर्तें और पे स्केल तय करने के लिए अधिकृत है।

    कोर्ट ने कहा,

    “यह कदम शिक्षकों को उच्च क्वालिफिकेशन हासिल करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए एक प्रोत्साहन के तौर पर भी है। कानून खुद शिक्षकों की अलग-अलग कैटेगरी को पहचानता है, जिनके पास PhD क्वालिफिकेशन है और जिनके पास नहीं है। उसी के अनुसार अलग-अलग अधिकार देता है।”

    ऑल इंडिया श्री शिवाजी मेमोरियल सोसाइटी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) मामले का हवाला दिया गया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने असिस्टेंट प्रोफेसरों के मामले में इसी तरह के अंतर को सही ठहराया था। सैलरी और करियर में आगे बढ़ने के लिए एकेडमिक क्वालिफिकेशन तय करने के एक्सपर्ट बॉडी के विवेक को सही माना था।

    सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के आदेशों में कोई कमी न पाते हुए, जिसने पहले लेक्चरर के दावों को खारिज कर दिया, हाईकोर्ट ने याचिकाओं को खारिज कर दिया।

    Case title: Sunil Kumar Tiwari And Ors. v. Govt. Of Nct Of Delhi And Ors.

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