एक्सप्लेनर: क्या होते हैं पीस बॉन्ड? किन परिस्थितियों में एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बांड भरवा सकते हैं?
Amir Ahmad
31 Oct 2026 12:56 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की नेता नेहा बोरा की याचिका खारिज की।
याचिका में उन्होंने 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में विरोध प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने के बाद स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) द्वारा जारी उस नोटिस को चुनौती दी, जिसमें उन्हें जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का व्यक्तिगत बांड और एक जमानतदार देने का निर्देश दिया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि नोटिस SEM की व्यक्तिपरक संतुष्टि पर आधारित था। मजिस्ट्रेट ने प्राप्त जानकारी, तीन जनरल डायरी प्रविष्टियों, 17 अक्टूबर 2026 की कलंदर (केस फाइल) और तीन गवाहों के बयानों की जांच की थी।
कोर्ट के अनुसार, यह प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 130 की आवश्यकताओं को पूरा करती है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शांति भंग होने की आशंका पर राय बनाते समय SEM को किसी तथ्य-जांच प्राधिकरण की तरह विस्तृत जांच करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह कार्रवाई निवारक होती है, दंडात्मक नहीं। शो-कॉज नोटिस जारी किए जाने के शुरुआती चरण में हाईकोर्ट SEM की जगह लेकर उसकी व्यक्तिपरक संतुष्टि की जांच नहीं कर सकता।
यह मामला BNSS के तहत शांति बनाए रखने के लिए बांड भरवाने की प्रक्रिया और उन परिस्थितियों को समझने का अवसर देता है, जिनमें एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट इस शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं।
पीस बॉन्ड एक निवारक उपाय है, जिसका उद्देश्य ऐसे व्यक्ति को संभावित रूप से शांति भंग करने से रोकना है। इसके लिए किसी FIR या अपराध का दर्ज होना जरूरी नहीं है।
किन परिस्थितियों में जारी हो सकता है नोटिस?
BNSS की धारा 126 के तहत यदि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को सूचना मिलती है कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है, तो वह उससे कारण बताने के लिए कह सकता है कि उससे शांति बनाए रखने का बांड क्यों न भरवाया जाए।
धारा 127 के तहत मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से एक वर्ष तक अच्छे आचरण के लिए बांड भरवाने का कारण बताने को कह सकता है। यह प्रावधान तब लागू होता है, जब मजिस्ट्रेट को सूचना मिले कि कोई व्यक्ति भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152, 196, 197 या 299 के तहत दंडनीय सामग्री का प्रसार कर रहा है, ऐसा करने का प्रयास कर रहा है या उसमें सहायता कर रहा है। इसमें किसी जज के खिलाफ मानहानिकारक या आपराधिक धमकी वाली सामग्री और अश्लील सामग्री का प्रसार भी शामिल है।
धारा 128 के तहत यदि मजिस्ट्रेट को सूचना मिले कि कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराध करने के उद्देश्य से अपनी मौजूदगी छिपाने का प्रयास कर रहा है, तो उससे शांति बनाए रखने का बांड भरने के संबंध में कारण बताने को कहा जा सकता है।
वहीं, धारा 129 के तहत यदि किसी व्यक्ति के आदतन अपराधी होने की सूचना मिलती है, तो एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट उससे तीन वर्ष तक अच्छे आचरण के लिए बांड भरने का कारण बताने को कह सकता है।
BNSS की धारा 130 के अनुसार, मजिस्ट्रेट को लिखित आदेश के जरिए शो-कॉज नोटिस जारी करना होगा। इसमें प्राप्त सूचना का सार, बांड की राशि, उसकी वैधता की अवधि और जमानतदारों की संख्या बतानी होगी। जमानतदारों की पर्याप्तता और उपयुक्तता पर भी विचार किया जाना चाहिए।
नोटिस जारी होने के बाद क्या प्रक्रिया होती है?
यदि नोटिस पाने वाला व्यक्ति अदालत में मौजूद है, तो धारा 131 के तहत धारा 130 का आदेश उसे पढ़कर सुनाया जाएगा। यदि वह चाहे तो आदेश का सार उसे समझाया भी जाएगा।
यदि व्यक्ति अदालत में मौजूद नहीं है, तो धारा 132 के तहत मजिस्ट्रेट उसे समन जारी करेगा। यदि वह हिरासत में है, तो उसे अदालत में पेश करने के लिए उस अधिकारी को वारंट जारी किया जाएगा, जिसकी हिरासत में वह है। धारा 133 के अनुसार, ऐसे प्रत्येक समन या वारंट के साथ धारा 130 के आदेश की प्रति भी दी जानी चाहिए।
धारा 134 मजिस्ट्रेट को यह अधिकार देती है कि वह व्यक्ति की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे और उसे वकील के माध्यम से पेश होने की अनुमति प्रदान करे।
मजिस्ट्रेट की जांच और अंतरिम बांड
इसके बाद धारा 135(1) के तहत मजिस्ट्रेट उस सूचना की सत्यता की जांच करेगा, जिसके आधार पर कार्यवाही शुरू की गई। जरूरत पड़ने पर वह अतिरिक्त साक्ष्य भी ले सकता है। यह जांच समन मामलों में सुनवाई और साक्ष्य दर्ज करने की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार की जाएगी।
धारा 135(3) के तहत मजिस्ट्रेट लिखित कारण दर्ज करने के बाद व्यक्ति को जांच पूरी होने तक शांति बनाए रखने के लिए अंतरिम बांड भरने का निर्देश दे सकता है। यदि व्यक्ति बांड नहीं भरता है, तो जांच पूरी होने तक उसे हिरासत में भी रखा जा सकता है।
हालांकि, धारा 127, 128 या 129 के तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही शुरू नहीं की गई है, तो उसे अच्छे आचरण के लिए बांड या जमानत बांड भरने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। बांड की शर्तें भी धारा 130 के शो-कॉज नोटिस में बताई गई शर्तों से अधिक कठोर नहीं हो सकतीं।
धारा 135(6) के अनुसार, जांच शुरू होने की तारीख से छह महीने के भीतर पूरी होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो छह महीने की अवधि समाप्त होने पर कार्यवाही समाप्त हो जाएगी, जब तक कि मजिस्ट्रेट विशेष कारण दर्ज कर जांच जारी रखने का निर्देश न दे। इस प्रकार, विशेष परिस्थितियों में छह महीने से आगे भी जांच जारी रह सकती है।
हालांकि, धारा 135(7) के तहत सेशन जज जांच जारी रखने के ऐसे निर्देश को रद्द कर सकता है, यदि उसे लगे कि बताए गए कारण विशेष कारण नहीं हैं या वे विकृत हैं।
जांच पूरी होने के बाद क्या होता है?
यदि जांच के बाद यह साबित हो जाता है कि शांति बनाए रखने के लिए बांड भरवाना जरूरी है, तो मजिस्ट्रेट धारा 136 के तहत अंतिम आदेश पारित करेगा। बांड की राशि और अवधि शो-कॉज नोटिस में बताई गई राशि और अवधि से अलग नहीं हो सकती।
बांड की राशि तय करते समय मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा और राशि अत्यधिक नहीं होनी चाहिए। यदि संबंधित व्यक्ति बच्चा है, तो बांड केवल उसके जमानतदारों द्वारा निष्पादित किया जाएगा।
इसके विपरीत, यदि जांच में यह साबित नहीं होता कि शांति बनाए रखने के लिए बांड जरूरी है, तो धारा 137 के तहत मजिस्ट्रेट रिकॉर्ड में इस आशय की प्रविष्टि करेगा। यदि व्यक्ति केवल जांच के उद्देश्य से हिरासत में है, तो उसे रिहा करने का निर्देश दिया जाएगा। यदि वह हिरासत में नहीं है, तो उसे कार्यवाही से मुक्त कर दिया जाएगा।
क्या मजिस्ट्रेट जमानतदार को अस्वीकार कर सकता है?
BNSS की धारा 140 के तहत मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति द्वारा पेश किए गए जमानतदार को स्वीकार करने से इनकार कर सकता है। वह पहले से स्वीकार किए गए जमानतदार को भी अयोग्य मानते हुए अस्वीकार कर सकता है।
हालांकि, ऐसा करने से पहले मजिस्ट्रेट को स्वयं जमानतदार की उपयुक्तता की जांच करनी होगी या अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट से जांच कराकर रिपोर्ट मंगानी होगी।
पीस बॉन्ड के आदेश को कैसे चुनौती दी जा सकती है?
यदि जांच पूरी होने तक अंतरिम स्तर पर SEM किसी व्यक्ति को पीस बॉन्ड भरने का निर्देश देता है, तो इस आदेश को BNSS की धारा 438 के तहत सेशन कोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका के जरिए चुनौती दी जा सकती है।
यह तर्क दिया जा सकता है कि ऐसा आदेश अंतरिम है और उसके खिलाफ पुनरीक्षण नहीं किया जा सकता।
हालांकि, अदालतों ने माना है कि जब मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति को जमानतदारों के साथ बांड भरने का निर्देश देता है, तो इससे उसके अधिकारों पर पर्याप्त प्रभाव पड़ता है और आदेश को केवल अंतरिम नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अमर नाथ एवं अन्य बनाम हरियाणा राज्य (1977) मामले में कहा था कि ऐसा आदेश जो आरोपी के अधिकारों को काफी हद तक प्रभावित करता है, उसे पुनरीक्षण पर रोक लगाने के उद्देश्य से अंतरिम आदेश नहीं माना जा सकता।
इसी फैसले का अनुसरण करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने अंकपुट्टास्वामी एवं अन्य बनाम पापेगौड़ा एवं अन्य (1978) मामले में कहा था कि याचिकाकर्ताओं को पीस बॉन्ड भरने का कारण बताने के लिए जारी सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के आदेशों को पुनरीक्षण में चुनौती दी जा सकती है।
वहीं, BNSS की धारा 414 के तहत जांच पूरी होने के बाद धारा 136 के अंतर्गत शांति या अच्छे आचरण के लिए सुरक्षा देने का निर्देश मिलने पर, या धारा 140 के तहत किसी जमानतदार को अस्वीकार किए जाने के आदेश से असंतुष्ट व्यक्ति सेशन कोर्ट में अपील कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेट की शक्तियों पर क्या कहा है?
इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला मधु लिमये बनाम सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट, मुंगेर (1970) है। सात जजों की संविधान पीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 और उसके अध्याय 8 के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी थी। ये प्रावधान अब क्रमशः BNSS की धारा 163 और अध्याय 9 यानी धाराओं 125 से 143 में शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) से (d) के तहत मौलिक अधिकारों पर उचित प्रतिबंध माना था। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता केवल कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही सीमित की जा सकती है, मजिस्ट्रेट की मनमर्जी से नहीं।
कोर्ट ने कहा था कि जांच वास्तव में शुरू किए बिना और साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया संतुष्टि दर्ज किए बिना किसी व्यक्ति को अंतरिम बांड भरने का निर्देश देना और उसे हिरासत में भेजना अवैध है।
मजिस्ट्रेट को शुरुआती चरण में भी यह सुनिश्चित करना होगा कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने के लिए प्रथम दृष्टया मामला मौजूद है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि व्यक्ति को वकील के जरिए अपना पक्ष रखने का अधिकार है और वह इसके लिए उचित समय भी मांग सकता है। मजिस्ट्रेट के लिए जांच शुरू किए बिना मामले को स्थगित करना और इस बीच बांड न भरने के कारण व्यक्ति को जेल भेजना उचित नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2018 में अल्दानिश रेन बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) मामले में इस फैसले का अनुसरण किया था। डिवीजन बेंच ने कहा था कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को रिमांड की मांग पर अपना दिमाग लगाना होगा और यह देखना होगा कि न्यायिक हिरासत का आदेश वास्तव में जरूरी है या नहीं।
कोर्ट ने SEM द्वारा बिना विचार किए एक जैसे प्रारूप वाले आदेश पारित करने की आलोचना भी की थी।
बांड की राशि के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में इस्तकार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में कहा था कि CrPC के अध्याय 8 के प्रावधान, जो अब BNSS के अध्याय 9 में हैं, केवल निवारक प्रकृति के हैं और उनका इस्तेमाल सजा देने के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। बांड का उद्देश्य सरकारी खजाना बढ़ाना नहीं, बल्कि संभावित शांति भंग को रोककर सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखना है।
क्या पीस बॉन्ड भरने के बाद उसी घटना को लेकर FIR दर्ज हो सकती है?
पीस बॉन्ड की कार्यवाही और FIR दर्ज करना दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। पीस बॉन्ड निवारक प्रकृति का है, जबकि एफआईआर किसी संज्ञेय अपराध की जांच शुरू करने का आधार बनती है। इसलिए पीस बॉन्ड भरने के बाद भी बाद की घटना या अपराध के संबंध में FIR दर्ज की जा सकती है। दोनों प्रक्रियाओं के अलग उद्देश्य होने के कारण ऐसी स्थिति में दोहरे दंड के सिद्धांत का तर्क अपने आप लागू नहीं होता।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने 2026 में बृज लाल एवं अन्य बनाम केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर एवं अन्य मामले में कहा था कि CrPC की धाराओं 107 और 117 के तहत कार्यवाही, जो अब BNSS की धाराओं 126 और 136 के अनुरूप हैं, निवारक प्रकृति की हैं, जबकि FIR के बाद शुरू होने वाली कार्यवाही दंडात्मक प्रकृति की होती है।
हालांकि, केवल बाद में FIR दर्ज हो जाने से यह साबित नहीं हो जाता कि पीस बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन हुआ है। मद्रास हाईकोर्ट ने 2026 में राम कुमार बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में कहा था कि FIR संज्ञेय अपराध की सूचना देकर जांच शुरू कराती है, लेकिन वह अपने आप में ठोस साक्ष्य नहीं है। इसी तरह, केवल FIR दर्ज होना निवारक बांड की शर्तों के उल्लंघन को निर्णायक रूप से साबित नहीं कर सकता। इसके लिए मजिस्ट्रेट को स्वतंत्र रूप से संतुष्ट होना होगा कि पीस बॉन्ड का उल्लंघन हुआ।

