गिनती में छोटी-मोटी गड़बड़ियां जाली करेंसी की ज़ब्ती को गलत साबित नहीं कर सकतीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने CBI की अपील मंज़ूर की, बरी करने का फैसला पलटा
Shahadat
6 Jan 2026 6:57 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने जाली करेंसी के मामले में आरोपी को बरी करने का फैसला रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जाली करेंसी नोटों की गिनती में छोटी-मोटी गड़बड़ियां अभियोजन पक्ष के मामले को गलत साबित करने के लिए काफी नहीं हैं, जब बरामदगी और कब्ज़ा उचित संदेह से परे साबित हो चुके हों।
CBI की अपील को मंज़ूर करते हुए जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें आरोपी को जाली करेंसी नोट रखने से जुड़े IPC की धारा 489C के तहत दंडनीय अपराध से बरी कर दिया गया।
बेंच ने कहा,
“जाली भारतीय करेंसी नोटों की गिनती में गलती और 1,000/- रुपये और 500/- रुपये के एक-एक नोट की कमी मानवीय गलती के कारण थी। इसे बरामदगी पर ही अविश्वास करने का आधार नहीं माना जा सकता। यह भी ध्यान नहीं दिया गया कि नोटों की गिनती में इस गड़बड़ी का ज़िक्र चार्जशीट में ही किया गया। इसके अलावा, कस्टम एक्ट, 1962 की धारा 108 के तहत आरोपी के बयान पर भी विचार नहीं किया गया, जिसमें उसने अपना अपराध स्वीकार किया था।”
अभियोजन पक्ष का मामला था कि आरोपी से बड़ी संख्या में जाली भारतीय करेंसी नोट बरामद किए गए, जिसके बाद उस पर मुकदमा चलाया गया।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को मुख्य रूप से इस आधार पर संदेह का लाभ दिया कि अलग-अलग दस्तावेज़ों और गवाहियों में बरामद नोटों की सही गिनती में विसंगतियां थीं।
असहमत होते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट सबूतों को सही नज़रिए से समझने में विफल रहा। उसने अपराध साबित करने वाली परिस्थितियों की पूरी श्रृंखला को नज़रअंदाज़ करते हुए, महत्वहीन विसंगतियों पर अनुचित ज़ोर दिया।
इसने नोट किया कि कस्टम एक्ट, 1962 की धारा 108 के तहत आरोपी का स्वैच्छिक बयान दर्ज किया गया, जिसमें उसने जाली करेंसी रखने की बात स्वीकार की थी।
इस संबंध में कोर्ट ने कहा,
“कस्टम अधिकारी के सामने कस्टम एक्ट की धारा 108 के तहत दिया गया बयान सबूत के तौर पर स्वीकार्य है। इसका इस्तेमाल बयान देने वाले के खिलाफ किया जा सकता है। धारा 108(b) का उद्देश्य ऐसे मामलों में सच्चाई का पता लगाना है। ऐसा बयान दर्ज करते समय कस्टम अधिकारी को निष्पक्ष और समझदारी से काम करना होता है, सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करना होता है ताकि बयान न्यूनतम न्यायिक मानकों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को पूरा करे।”
यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम पदम नारायण अग्रवाल (2008) मामले पर भरोसा किया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धारा 108 एक कस्टम अधिकारी को जांच किए जा रहे व्यक्ति से सच जानने का अधिकार देता है।
आगे कहा गया,
“धारा 108 का मुख्य मकसद यह पक्का करना है कि किसी व्यक्ति से पूछताछ करने वाले अधिकारी को घटना के बारे में पूरा सच पता चले। यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं है।”
इसलिए हाईकोर्ट ने अपील मंज़ूर कर ली और प्रतिवादी को IPC की धारा 489C के तहत दोषी ठहराया।
सज़ा के सवाल पर मामले की सुनवाई 16 जनवरी को होगी।
Case title: CBI v. Kukwant Rai

