सिर्फ़ शादी से मना करना या मैसेज का जवाब न देना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने अग्रिम ज़मानत दी
Shahadat
24 Feb 2026 9:08 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने ऐसे व्यक्ति को अग्रिम ज़मानत दी, जिस पर अपने पुराने पार्टनर को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ शादी से मना करना या मैसेज का जवाब न देना इंडियन पैनल कोड, 1860 (IPC) की धारा 306 के तहत उकसाने या उकसाने का मामला नहीं है।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि सिर्फ़ एक सुसाइड नोट अपने आप में ज़मानत देने से मना करने के लिए काफ़ी नहीं है, जब तक कि उकसाने का कोई साफ़, नज़दीकी काम न हो।
जज ने इस बात पर ज़ोर दिया कि IPC की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत अपराध के लिए एक "एक्टिव और डायरेक्ट काम" और साफ़ मेंस रिया होना चाहिए।
प्रॉसिक्यूशन के अनुसार, शिकायत करने वाली की बेटी ने 9 मई, 2023 को सीलिंग फैन से लटककर आत्महत्या कर ली थी। मौके से दो सुसाइड नोट, नोटबुक और उसका मोबाइल फ़ोन बरामद हुए।
पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट में मौत की पुष्टि हुई कि मौत एंटीमॉर्टम हैंगिंग की वजह से दम घुटने से हुई और FSL जांच से कथित तौर पर यह पुष्टि हुई कि सुसाइड नोट मृतक ने ही लिखे थे।
FIR अगस्त, 2025 में मृतक के माता-पिता द्वारा CrPC की धारा 156(3) के तहत दायर आवेदन पर ट्रायल कोर्ट के आदेश के अनुसार दर्ज की गई।
सुसाइड नोट में कथित तौर पर कहा गया कि आरोपी मृतक के साथ दो साल से रिलेशनशिप में था, उसने उससे शादी करने का वादा किया, शारीरिक संबंध बनाए और बाद में परिवार के दबाव के कारण शादी से इनकार किया।
आरोपी को राहत देते हुए जस्टिस बनर्जी ने कहा कि हालांकि प्रॉसिक्यूशन का मामला मृतक के कथित सुसाइड नोट के कंटेंट पर आधारित है। हालांकि, इसे साबित करने के लिए कुछ भी भरोसेमंद नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
“आखिरकार यह मृतक का एक ही रूप है। आत्महत्या करने से पहले आवेदक के साथ मृतक के WhatsApp टेक्स्ट का लेन-देन भी किसी भी गलत बात की ओर इशारा नहीं करता है, जो फिलहाल आवेदक को ज़मानत देने से मना करने के लिए काफ़ी है।”
कोर्ट ने आगे कहा,
“और भी ज़्यादा, क्योंकि एकमात्र आरोप यह है कि उसने मिले टेक्स्ट का जवाब नहीं दिया। इसलिए आत्महत्या करने से सीधे और नज़दीकी संबंध रखने वाला उकसाने/उकसाने का कोई एक्टिव/साफ़ काम नहीं है।”
सहयोग न करने के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान सिर्फ़ “वांछित जवाब” न देना अपने आप में ज़मानत देने से मना करने का आधार नहीं हो सकता, खासकर तब जब शामिल न होने की हद साफ़ न हो।
कोर्ट ने कहा,
“सिर्फ़ 'पसंद के' जवाब न मिलना, ज़मानत देने से मना करने का कारण नहीं है, और तब भी जब शामिल न होने का लेवल ही साफ़ न हो। किसी भी हालत में प्रॉसिक्यूशन को ऐसे मामले में हमेशा ज़रूरी और सही कदम उठाने का अधिकार होता है।”
यह मानते हुए कि आवेदक ने पहली नज़र में अग्रिम जमानत देने का मामला बनाया, कोर्ट ने निर्देश दिया कि गिरफ़्तारी की स्थिति में उसे 1,00,000 रुपये के पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही रकम की एक ज़मानत पर रिहा किया जाए।
Title: UJJWAL v. STATE (GOVT. OF NCT OF DELHI)

