सिर्फ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से पुलिस के काम में बाधा डालने का 'साझा इरादा' साबित नहीं होता: दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द की FIR

  • सिर्फ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से पुलिस के काम में बाधा डालने का साझा इरादा साबित नहीं होता: दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द की FIR

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी विरोध प्रदर्शन में केवल शामिल हो जाने भर से यह साबित नहीं हो जाता कि व्यक्ति का पुलिस के वैध निर्देशों को न मानने या पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डालने का कोई 'साझा इरादा' (common intention) था।

    जस्टिस संजीव नरूला ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने खुर्शीद अहमद के खिलाफ दर्ज FIR रद्द की। अहमद SSC परीक्षा की तैयारी करने वाला स्टूडेंट है, जो 24 अगस्त 2025 को दिल्ली के रामलीला मैदान में परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल हुआ।

    कोर्ट ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 3(5) के तहत 'साझा इरादे' के सिद्धांत के लिए यह जरूरी है कि आपराधिक कृत्य उन लोगों के साझा इरादे को आगे बढ़ाने के लिए किया गया हो, जिन्हें संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

    कोर्ट ने कहा,

    "एक ही विरोध प्रदर्शन में शामिल होने भर से यह साबित नहीं हो जाता कि पुलिस के वैध निर्देशों को न मानने या पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डालने का कोई साझा इरादा था।"

    यह FIR कमला मार्केट पुलिस स्टेशन में BNS की धारा 223(a) और 3(5) के तहत दर्ज की गई। 24 और 25 अगस्त 2025 को सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति दी गई।

    दिल्ली पुलिस के अनुसार, मौके पर लगभग 800 से 1,000 लोग जमा हुए। अनुमति का समय खत्म होने के बाद भी कुछ प्रदर्शनकारी वहां से नहीं हटे, जबकि उन्हें बार-बार वहां से जाने के निर्देश दिए गए। पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों को धक्का दिया और उनके साथ हाथापाई की। इस घटना के सिलसिले में हिरासत में लिए गए 44 लोगों में अहमद भी शामिल था।

    हाईकोर्ट के सामने अहमद ने दलील दी कि वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाला छात्र है और SSC परीक्षाओं से जुड़ी अपनी शिकायतों को रखने के लिए विरोध प्रदर्शन में शामिल हुआ। उसने कहा कि वह न तो इस प्रदर्शन का आयोजक था और न ही कोई वक्ता, और उस पर पुलिस के निर्देशों को न मानने, काम में बाधा डालने, हिंसा करने या पुलिस के साथ हाथापाई करने का कोई विशेष आरोप नहीं है।

    अभियोजन पक्ष ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि लाउडस्पीकर के जरिए बार-बार घोषणाएं किए जाने और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निर्देश दिए जाने के बावजूद, प्रदर्शनकारी उस जगह पर डटे रहे। अदालत को यह भी बताया गया कि 29 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, जबकि बाकी प्रदर्शनकारियों के संबंध में जांच अभी भी चल रही है।

    BNS की धारा 223(a) के प्रावधानों पर गौर करते हुए अदालत ने कहा कि यह धारा किसी लोक सेवक द्वारा कानूनी रूप से जारी किए गए आदेश की अवहेलना करने पर दंड का प्रावधान करती है—बशर्ते संबंधित व्यक्ति को उस आदेश की जानकारी हो, और उसकी इस अवहेलना से वे परिणाम सामने आएं (या आने की संभावना हो) जिनका जिक्र इस धारा में किया गया।

    अदालत ने कहा,

    "इस मामले में यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि मैदान खाली करने से इनकार करने, प्रदर्शनकारियों को उकसाने और पुलिसकर्मियों के साथ हाथापाई करने के आरोप मुख्य रूप से आयोजकों या पूरी भीड़ पर लगाए गए। न तो संबंधित FIR में और न ही बाद में दाखिल की गई स्टेटस रिपोर्ट में याचिकाकर्ता पर विशेष रूप से ऐसा कोई आचरण करने का आरोप लगाया गया।"

    अदालत ने कहा कि हालांकि वहां से हटने के निर्देशों की जानकारी होने के बावजूद घटनास्थल पर बने रहना आदेश की अवहेलना माना जा सकता है, लेकिन रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह स्पष्ट नहीं होता कि अहमद की वहां मौजूदगी किस तरह BNS की धारा 223(a) के तहत जरूरी कानूनी शर्तों को पूरा करती है।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    "केवल प्रदर्शनकारियों के बीच मौजूद होने भर को बिना किसी अन्य सबूत के अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।"

    जस्टिस नरूला ने आगे कहा कि अहमद ने BNSS की धारा 35 के तहत जारी नोटिस के बाद जांच में सहयोग किया, और दिल्ली पुलिस ने भी ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया कि उन्होंने सहयोग करने से इनकार किया या जांच में बाधा डालने की कोशिश की।

    अदालत ने कहा,

    "याचिकाकर्ता के खिलाफ केवल इसलिए आपराधिक कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती, क्योंकि वह प्रदर्शनकारियों के बीच मौजूद था; खासकर तब, जब ऐसा कोई सबूत न हो जो यह दिखाए कि उसने जानबूझकर आदेश की अवहेलना में हिस्सा लिया था, या उसका अपराध करने का कोई साझा इरादा था।"

    इसके अनुसार, अदालत ने अहमद की याचिका स्वीकार की और FIR तथा उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को उसके (अहमद के) संदर्भ में रद्द किया।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल अहमद की भूमिका तक सीमित हैं और इनका किसी अन्य आरोपी के खिलाफ चल रही जांच या कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

    Case Title : KHURSHI AHMED v. STATE OF NCT OF DELHI THROUGH SHO PS KAMLA MARKET

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