सिर्फ़ जाली जाति प्रमाण-पत्र देने से वकील को स्टेट रोल से नहीं हटाया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
8 Oct 2026 8:18 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ़ जाली जाति प्रमाण-पत्र जमा करने के आधार पर किसी वकील को स्टेट बार रोल से नहीं हटाया जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि कथित धोखाधड़ी या गलत जानकारी का एनरोलमेंट (पंजीकरण) हासिल करने से कोई संबंध है।
जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने कहा,
"...एनरोलमेंट रिकॉर्ड में धोखाधड़ी वाले दस्तावेज़ का होना ही अपने आप में धोखाधड़ी से एनरोलमेंट हासिल करने के बराबर नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि उस एनरोलमेंट को हासिल करने में धोखाधड़ी की अहम भूमिका है।"
कोर्ट ने यह टिप्पणी बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) का वह आदेश रद्द करते हुए की, जिसमें वकील को जाली OBC जाति प्रमाण-पत्र जमा करने के कारण रोल से हटा दिया गया।
हालांकि, कोर्ट ने जाली प्रमाण-पत्र जमा करने के लिए वकील की आलोचना और फटकार भी लगाई और स्पष्ट किया कि उन्हें हटाने के आदेश को रद्द करने का मतलब उनके आचरण को सही ठहराना नहीं है।
7 मई को पारित आदेश के ज़रिए, BCI ने यह निष्कर्ष निकालने के बाद उनका नाम स्टेट रोल से हटा दिया कि उन्होंने धोखाधड़ी या गलत जानकारी देकर एनरोलमेंट हासिल किया।
इसके बाद 2026 के बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली चुनाव में उनकी उम्मीदवारी भी रद्द कर दी गई। विवादित OBC जाति प्रमाण-पत्र (11 अक्टूबर, 2011 का) जाली पाया गया, जब राजस्व अधिकारियों ने BCD को सूचित किया कि प्रमाण-पत्र सक्षम अधिकारी द्वारा जारी नहीं किया गया। यह प्रमाण-पत्र 2019 में वकील के एनरोलमेंट के समय से ही उनके एनरोलमेंट रिकॉर्ड का हिस्सा था।
कोर्ट ने एनरोलमेंट प्रक्रिया के दौरान गलत दस्तावेज़ जमा करने और धोखाधड़ी से एनरोलमेंट हासिल करने के बीच अंतर स्पष्ट किया।
कोर्ट ने कहा कि जहां धोखाधड़ी से एनरोलमेंट हासिल करने का आरोप हो, वहां जांच केवल इस बात पर खत्म नहीं होनी चाहिए कि एनरोलमेंट प्रक्रिया के दौरान कोई जाली या बनावटी दस्तावेज़ जमा किया गया।
कोर्ट ने कहा कि इस बात की जांच होनी चाहिए कि क्या कथित धोखाधड़ी का संबंध व्यक्ति के स्टेट रोल में शामिल होने से था और क्या उसका इस पर कोई असर पड़ा था।
जज ने कहा,
“गलत जानकारी या धोखाधड़ी से आवेदक की योग्यता पर बड़ा असर पड़ता और इसी के ज़रिए एनरोलमेंट (नामांकन) हासिल किया जाता। ऐसा मामला सीधे तौर पर एडवोकेट्स एक्ट की धारा 26(1) के प्रोविज़ो (शर्त) के तहत आने वाली गड़बड़ी के दायरे में आता।”
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि भले ही वकील ने ग्रेजुएशन में 44.5% अंक हासिल किए, लेकिन दिल्ली बार काउंसिल के एक प्रस्ताव में पहले से ही उन उम्मीदवारों के एनरोलमेंट की इजाज़त थी जिनके अंक 45% से कम थे, बशर्ते उन्होंने BCI से मान्यता प्राप्त संस्थान से लॉ की डिग्री हासिल की हो।
कोर्ट ने पाया कि जब वकील ने एनरोलमेंट के लिए आवेदन किया था, तब वह प्रस्ताव लागू था और असल में उनके एनरोलमेंट के लिए उसी पर भरोसा किया गया।
इस तरह, कोर्ट ने कहा कि अगर विवादित जाति प्रमाण पत्र कभी जमा नहीं भी किया जाता, तब भी वकील एनरोलमेंट पर विचार किए जाने और एनरोलमेंट पाने की पात्र होतीं।
कोर्ट ने कहा,
“इसलिए यह कोर्ट मानता है कि मौजूदा मामले के खास तथ्यों और परिस्थितियों में, सिर्फ़ विवादित जाति प्रमाण पत्र जमा करने को एडवोकेट्स एक्ट की धारा 26(1) के प्रोविज़ो को लागू करने के लिए काफ़ी नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने आगे कहा कि BCI को सिर्फ़ इस बात से संतुष्ट नहीं होना है कि वकील ने कोई जाली दस्तावेज़ जमा किया है, बल्कि यह भी देखना था कि क्या उन्होंने किसी ज़रूरी तथ्य के बारे में धोखाधड़ी या गलत जानकारी देकर वकीलों की सूची (रोल) में अपना नाम दर्ज कराया।
इसके अनुसार, जस्टिस शर्मा ने माना कि कथित धोखाधड़ी और एनरोलमेंट हासिल करने के बीच ज़रूरी संबंध नहीं था और धारा 26(1) के प्रोविज़ो को लागू करने की शुरुआती शर्त पूरी नहीं हुई।
कोर्ट ने कहा,
“इसलिए BCI द्वारा 07.05.2026 को पारित विवादित आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता। यह निष्कर्ष कि याचिकाकर्ता ने विवादित जाति प्रमाण पत्र जमा किया, बना रहेगा; हालांकि, यह निष्कर्ष कि प्रमाण पत्र जमा करने से धारा 26(1) का प्रोविज़ो लागू होता है और इसके कारण उनका नाम स्टेट रोल से हटाया जाना चाहिए, उसे रद्द किया जाता है।”
कोर्ट ने निर्देश दिया कि वकील का नाम तुरंत दिल्ली बार काउंसिल के रोल में बहाल किया जाए। ऐसा करते हुए कोर्ट ने वकील को फटकार लगाई, क्योंकि उन्होंने एनरोलमेंट के लिए अपनी योग्यता साबित करने के लिए ऐसे दस्तावेज़ पर निर्भर रहने की कोई ज़रूरत न होने के बावजूद, अपनी एनरोलमेंट एप्लीकेशन के साथ विवादित जाति प्रमाण पत्र जमा किया।
कोर्ट ने कहा,
"इस याचिका में उन्हें जो राहत दी गई, वह एडवोकेट्स एक्ट की धारा 26(1) के तहत कानूनी नतीजों तक ही सीमित है, और इसे उनके आचरण की मंज़ूरी नहीं माना जाना चाहिए।"
Case Title : DIPINDER KAUR v. BAR COUNCIL OF DELHI & ORS

