जस्टिस एसके शर्मा के बच्चों का अरविंद केजरीवाल के केस में कोई रोल नहीं: CBI ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा
Shahadat
16 April 2026 8:15 PM IST

सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने दिल्ली हाईकोर्ट में AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल द्वारा दायर अतिरिक्त हलफनामे का विरोध किया। इस हलफनामे में केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर पक्षपात का आरोप लगाया, जिसका आधार यह है कि उनके बच्चे केंद्र सरकार के पैनल वकील हैं।
अपने जवाब में CBI ने कहा कि जस्टिस शर्मा के दोनों बच्चों में से किसी ने भी शराब नीति मामले से जुड़े मामलों में न तो कभी काम किया, न किसी की मदद की, और न ही किसी भी क्षमता में शामिल रहे हैं।
हलफनामे में कहा गया,
"न तो मिस्टर ईशान शर्मा और न ही मिस शंभवी शर्मा ने कभी भी वर्तमान अपराध से जुड़े किसी भी मामले में किसी भी अदालत के सामने कार्यवाही के किसी भी चरण में अतीत में किसी भी तरह से काम किया या किसी की मदद की है; और न ही वे इस मामले में किसी भी क्षमता में शामिल रहे हैं। दोनों स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करने वाले वकील हैं और किसी भी सीनियर वकील से जुड़े हुए नहीं हैं।"
CBI ने आगे कहा कि ईशान शर्मा 2022 से ही भारत सरकार के पैनल में हैं। यह उस आरोप के विपरीत है, जिसमें कहा गया कि उन्हें हाल ही में 2025 में पैनल में शामिल किया गया। इसके अलावा, उन्हें अन्य पैनल वकीलों के साथ मिलकर अलग-अलग मामलों में कानून अधिकारियों की सहायता करने के लिए मामले सौंपे जाते हैं।
बता दें, अपने अतिरिक्त जवाब में केजरीवाल ने कहा था कि जस्टिस शर्मा के बच्चों को सॉलिसिटर जनरल द्वारा काम सौंपा जाता है, जो जस्टिस शर्मा के सामने CBI की ओर से पेश हुए। उनके अनुसार, इससे जस्टिस शर्मा की ओर से पक्षपात की एक उचित आशंका पैदा होती है, जिसके चलते उन्हें शराब नीति मामले में आरोपमुक्त करने के खिलाफ CBI की याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लेना चाहिए।
जांच एजेंसी ने कहा कि यदि ऐसे आरोपों को स्वीकार कर लिया जाता है तो सभी जज राज्य या केंद्र सरकारों अथवा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) से जुड़े मामलों की सुनवाई करने के लिए अयोग्य घोषित हो जाएंगे।
इन आरोपों को बाद में गढ़ा गया (Afterthought) बताते हुए CBI ने कहा कि जस्टिस शर्मा के खिलाफ एक "सुनियोजित सोशल मीडिया अभियान" चलाया जा रहा है।
CBI ने कहा कि यदि केजरीवाल के तर्क को आगे बढ़ाया जाए तो वे सभी जज जिनके रिश्तेदार राज्य या केंद्र सरकार अथवा किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के पैनल में शामिल हैं, संबंधित राज्य सरकारों, केंद्र सरकार, या संबंधित PSUs के मामलों की सुनवाई करने के लिए अयोग्य घोषित हो जाएंगे।
CBI ने अपने जवाब में यह भी कहा कि अगर केजरीवाल का यह आरोप कि जस्टिस शर्मा 'अधिवक्ता परिषद' के कार्यक्रमों में शामिल होते हैं - जिसे वह एक राजनीतिक संगठन मानते हैं - उनके केस से हटने (Recusal) का आधार बनता है तो फिर हर जज केजरीवाल से जुड़े किसी भी मामले की सुनवाई करने के लिए अयोग्य हो जाएगा। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि केजरीवाल के मन में यह "धारणा" या "उचित पूर्वाग्रह" बन जाएगा कि जो भी जज अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में शामिल होता है, वह निश्चित रूप से पक्षपाती होता है।
इन आरोपों का विरोध करते हुए CBI ने अदालत को बताया कि केजरीवाल और अन्य आरोपी प्रतिवादी इस बात को लेकर "पूरी तरह आश्वस्त" थे कि उन्हें केस से बरी होने में सफलता मिलेगी। उन्हें यह भी यकीन था कि इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी और रोस्टर के अनुसार, इस मामले की सुनवाई जस्टिस शर्मा के सामने ही होगी।
एजेंसी ने आगे कहा कि 11 फरवरी को एक अज्ञात व्यक्ति ने, जो इस कानूनी कार्यवाही का हिस्सा नहीं था, एक RTI दायर की थी। इस RTI से जुड़ी जानकारी 18 मार्च को उपलब्ध करा दी गई। एजेंसी का कहना है कि जैसे ही 6 अप्रैल को जस्टिस शर्मा ने एक आदेश जारी किया, जिसमें CBI को केस से हटने (Recusal) वाली अर्जियों पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा गया, ठीक उसी समय अचानक RTI आवेदक का एक ट्वीट सामने आया। इस ट्वीट में उसने वही जानकारी "सार्वजनिक" की थी, जो केजरीवाल के पास 18 मार्च से ही मौजूद थी।
CBI ने कहा,
"इस ट्वीट को कुछ ही घंटों के भीतर मिस्टर अरविंद केजरीवाल ने तुरंत रीट्वीट किया। उनके साथ-साथ मिस्टर अरविंद केजरीवाल की पार्टी के अन्य नेताओं ने भी एक साथ मिलकर इसे रीट्वीट किया।"
CBI ने यह भी कहा कि 9 अप्रैल के बाद से एक बहुत ही "चुनिंदा, सोची-समझी और बेहद तीखी ऑनलाइन मुहिम" चलाई जा रही है। इस मुहिम के तहत जान-बूझकर "गलत सूचनाएं" ट्वीट और रीट्वीट की जा रही हैं, तथा सरकारी पैनल के कामकाज को लेकर बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं। इस पूरी कवायद का एकमात्र मकसद या तो जस्टिस शर्मा को शर्मिंदा करना है, या फिर अदालत की पीठ (बेंच) पर दबाव बनाना है।
जांच एजेंसी ने कहा कि न्यायपालिका जैसी संस्था के व्यापक हित को देखते हुए "अनैतिक, अस्वस्थ और अराजक" किस्म की इन हरकतों को शुरू में ही सख्ती से कुचल देना (nip in the bud) बेहद ज़रूरी है।
हलफनामे में कहा गया,
“अब समय आ गया कि इस संवैधानिक अदालत से एक संदेश जाए कि बेईमान लोग, सोशल मीडिया और ऐसे ऐप्स का इस्तेमाल करके जिनमें बेबुनियाद आरोप लगाए गए हों, किसी भी जज को शर्मिंदा नहीं कर सकते, बदनाम नहीं कर सकते, इस तरह उन पर दबाव नहीं डाल सकते कि वे किसी ऐसे आदेश का बचाव करें जिसका बचाव नहीं किया जा सकता, या कोई मनचाहा नतीजा हासिल करें।”
इसके अलावा, CBI ने यह तर्क दिया कि वह अपना काम आज़ादी से कर रही है, और इसलिए उसे इस मामले की सुनवाई जस्टिस शर्मा या किसी अन्य बेंच द्वारा किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।
इसमें कहा गया,
“हालांकि, CBI इस खास मामले को एक अलग-थलग मामले के तौर पर नहीं देख रही है, जहां कोई बेईमान मुक़दमेबाज़ या मुक़दमेबाज़, बेबुनियाद, आधारहीन, शरारतपूर्ण और अपमानजनक आरोप लगाकर, और दूसरे लोगों तथा सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके, इस संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाने की कोशिश कर रहा है।”
जवाब में आगे कहा गया,
“अगर CBI, एक केंद्रीय जांच एजेंसी के तौर पर ऐसी परिस्थितियों में कोई मज़बूत रुख नहीं अपनाती है। अगर माननीय बेंच भी ऐसे दबाव बनाने वाले हथकंडों के आगे झुक जाती है तो यह एक बहुत ही दुखद और अस्वस्थ परंपरा बन जाएगी, जिससे हर जज ऐसे सुनियोजित दबाव वाले हथकंडों और बदनाम करने वाले अभियानों के निशाने पर आ जाएगा, जिसका नतीजा यह हो सकता है कि वह अपने सामने आए मामलों पर बिना किसी डर या पक्षपात के फ़ैसला लेने में भारी रुकावट महसूस करे।”
आखिर में, CBI ने कहा कि केजरीवाल द्वारा दायर किए गए अतिरिक्त हलफनामे की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए, क्योंकि इसे बहुत देर से दायर किया गया; जबकि केजरीवाल के पास 18 मार्च से ही “बदनाम करने वाले अभियान” की पूरी जानकारी मौजूद थी, और अन्य सभी आरोप लगाने के बाद ही उन्होंने यह हलफनामा दायर किया।
इससे पहले, गुरुवार को केजरीवाल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए जस्टिस शर्मा के सामने खुद पेश हुए और उनसे अनुरोध किया कि वह उनके नए जवाब को रिकॉर्ड पर ले लें। इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए अदालत ने अतिरिक्त हलफनामे को रिकॉर्ड पर ले लिया।
बता दें, 13 अप्रैल को जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल और अन्य आरोपियों द्वारा दायर उन आवेदनों पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था, जिनमें उन्होंने शराब नीति मामले में सभी आरोपियों को बरी किए जाने के फ़ैसले को चुनौती देने वाली CBI की पुनर्विचार याचिका की सुनवाई से खुद को अलग करने का अनुरोध किया था।
सुनवाई के दौरान, केजरीवाल ने खुद इस मामले पर बहस की। उन्होंने मौखिक रूप से यह बात रखी कि सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि जस्टिस शर्मा के बच्चों का केंद्र सरकार के साथ पेशेवर जुड़ाव है।
केजरीवाल ने यह तर्क दिया कि स्थापित परंपराओं के अनुसार, अगर किसी जज के रिश्तेदारों का मामले में शामिल किसी भी पक्ष के साथ कोई जुड़ाव होता है तो जज खुद को उस मामले की सुनवाई से अलग कर लेते हैं। सुनवाई खत्म होने के बाद केजरीवाल ने एक नया हलफनामा दायर किया, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसे रिकॉर्ड मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि जस्टिस शर्मा के बच्चों को केंद्र सरकार के वकील के तौर पर पैनल में शामिल किया गया। जहां उनके बेटे सुप्रीम कोर्ट के लिए ग्रुप ए पैनल वकील हैं, वहीं उनकी बेटी ग्रुप सी पैनल वकील हैं।
केजरीवाल ने कहा कि चूंकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता CBI की तरफ से जस्टिस शर्मा के सामने उनकी रिहाई का विरोध कर रहे हैं, इसलिए इससे हितों के टकराव का सीधा और गंभीर मामला बनता है। उन्होंने दलील दी कि सॉलिसिटर जनरल को सुनवाई की पहली तारीख को ही इस संबंध का खुलासा कर देना चाहिए था।

