20 से ज़्यादा बार ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं हुए जांच अधिकारी, विचाराधीन कैदी ने जेल में बिताये 6 साल: दिल्ली हाईकोर्ट ने जताया अफ़सोस

Shahadat

22 Aug 2026 9:19 PM IST

  • 20 से ज़्यादा बार ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं हुए जांच अधिकारी, विचाराधीन कैदी ने जेल में बिताये 6 साल: दिल्ली हाईकोर्ट ने जताया अफ़सोस

    दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि वह जांच अधिकारियों (IOs) को संवेदनशील बनाएं ताकि वे लंबित मामलों को तेज़ी से निपटाने में समय पर सहयोग करें, खासकर उन मामलों में जहां आरोपी लंबे समय से हिरासत में हैं। [2026 LiveLaw (Del) 781]

    जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने यह आदेश दो आरोपियों को ज़मानत देते हुए पारित किया, जो 2020 के हत्या के मामले में लगभग छह साल से जेल में बंद थे।

    कोर्ट ने ट्रायल की धीमी गति और इस तथ्य पर ध्यान दिया कि जांच अधिकारी (IO) 20 से ज़्यादा बार कार्यवाही में अनुपस्थित रहे थे।

    कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली ऐसी स्थिति को बर्दाश्त नहीं कर सकती, जहां आरोपी सालों तक हिरासत में रहे और IO के बार-बार पेश न होने के कारण कार्यवाही में बाधा आए।

    कोर्ट ने कहा,

    "ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए इस आदेश की एक प्रति दिल्ली पुलिस कमिश्नर को भेजी जाए ताकि IOs को संवेदनशील बनाया जा सके और वे लंबित मामलों को तेज़ी से निपटाने में समय पर सहयोग सुनिश्चित करें, खासकर उन मामलों में जहां आरोपी लंबे समय से हिरासत में हैं।"

    यह FIR सोनिया विहार पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 302, 120B और 34 के तहत अपराधों और आर्म्स एक्ट के प्रावधानों के तहत दर्ज की गई।

    दोनों आरोपियों ने कहा कि वे पहले ही लगभग छह साल की जेल काट चुके हैं और निकट भविष्य में ट्रायल पूरा होने की कोई संभावना नहीं है।

    यह भी तर्क दिया गया कि एक आरोपी की ज़मानत पहले मेरिट के आधार पर खारिज की गई, लेकिन लंबे समय तक जेल में रहने और ट्रायल की धीमी प्रगति ने ऐसी नई परिस्थितियां पैदा कर दी हैं, जिनके आधार पर मामले पर फिर से विचार किया जा सकता है।

    ज़मानत का विरोध करते हुए दिल्ली पुलिस ने कहा कि अपराध में इस्तेमाल हथियार, एक देसी पिस्तौल, आवेदकों में से एक और एक अन्य सह-आरोपी की निशानदेही पर बरामद किया गया, जबकि बैलिस्टिक रिपोर्ट से यह साबित हुआ कि गोली लगने से हुई चोटें उसी हथियार से लगी थीं। दूसरे आवेदक के मामले में राज्य ने कहा कि अपराध में इस्तेमाल किया गया सर्जिकल ब्लेड उसकी निशानदेही पर बरामद किया गया और उस पर मृतक को खत्म करने की साजिश में शामिल होने का आरोप था।

    ज़मानत की अर्ज़ियों को मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने देखा कि आवेदक पहले ही लगभग छह साल जेल में बिता चुके हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि चश्मदीद गवाह के बयान को पहली नज़र में देखने पर आवेदकों पर कोई सीधा काम (Overt Act) करने का आरोप नहीं लगाया गया।

    जस्टिस कौरव ने यह भी कहा कि ट्रायल बहुत धीमी गति से आगे बढ़ा है और निकट भविष्य में इसके पूरा होने की कोई संभावना नहीं है।

    जज ने कहा,

    "पिछली ज़मानत अर्ज़ी खारिज होने के बाद ट्रायल में हुई यह देरी एक ऐसी नई परिस्थिति है, जिसके कारण आवेदक की ज़मानत की अर्ज़ी पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है।"

    कोर्ट ने पाया कि काफी समय बीतने के बावजूद ट्रायल उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ा और आवेदक लगभग छह साल जेल में बिता चुके हैं, जबकि ट्रायल अभी भी लंबित है।

    कोर्ट ने कहा,

    "सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए - जिसमें आवेदकों द्वारा पहले ही बिताई गई लगभग छह साल की जेल की अवधि, ट्रायल की धीमी गति, 24 में से केवल 10 गवाहों से पूछताछ होना, ट्रायल पूरा होने में देरी के लिए आवेदकों का ज़िम्मेदार न होना, और PW-1 के बयान में आवेदकों की कोई सीधी भूमिका न होना शामिल है - इस कोर्ट की यह राय है कि आवेदकों ने रेगुलर ज़मानत पाने के लिए मामला बनाया है।"

    Title: VIKAS v. STATE GOVT OF NCT OF DELHI & other connected matter

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