हाईकोर्ट ने ज़मानत मामले में प्रॉसिक्यूटर को जानकारी न देने पर दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई, DCP को पेश होने का निर्देश दिया
Shahadat
15 Sept 2026 10:31 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने ज़मानत के मामलों में प्रॉसिक्यूटर (सरकारी वकील) को समय पर जानकारी न देने के लिए दिल्ली पुलिस की आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि ऐसी लापरवाही यह दिखाती है कि पुलिस व्यक्तिगत आज़ादी के मुद्दे को किस तरह से ले रही है।
जस्टिस गिरीश कठपालिया ने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट (NDPS Act) की धारा 22 और 29 के तहत दर्ज FIR से जुड़ी दो ज़मानत याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं।
कोर्ट ने गौर किया कि ये मामले पिछले साल दिसंबर से अलग-अलग बेंचों के सामने लंबित थे और सुनवाई के लिए उसके पास ट्रांसफर किए गए।
कोर्ट ने कहा,
"ये एक और उदाहरण हैं कि दिल्ली पुलिस व्यक्तिगत आज़ादी के मुद्दे को किस तरह से ले रही है।"
कोर्ट ने पाया कि बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद, जांच अधिकारी सरकारी वकील को समय पर जानकारी नहीं दे रहे थे, जिसके कारण सरकारी वकील को कोर्ट में बेबसी ज़ाहिर करनी पड़ी।
कोर्ट ने दर्ज किया कि ज़मानत याचिकाएं पुरानी हैं और कई महीनों से लंबित हैं, फिर भी जांच अधिकारी ने मामले की सुनवाई शुरू होने तक एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (APP) से मिलकर उन्हें जानकारी नहीं दी।
इसके अलावा, जस्टिस कठपालिया ने गौर किया कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि एक सह-आरोपी को हाई कोर्ट ने पहले अप्रैल 2025 में ज़मानत दी थी और उस आदेश में विस्तृत परिस्थितियां दर्ज हैं, जो केस डायरी में हेरफेर की ओर इशारा करती हैं, साथ ही ट्रायल कोर्ट को स्वतंत्र राय बनाने की छूट भी दी गई।
कोर्ट ने कहा कि ये परिस्थितियां मौजूदा ज़मानत याचिकाओं पर विचार करने के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन APP इस मुद्दे पर बात करने में असमर्थ रहे, क्योंकि जांच अधिकारी ने उन्हें जानकारी नहीं दी।
कोर्ट ने कहा,
"इस कोर्ट के पास एक विकल्प यह है कि दोनों आरोपियों को तुरंत ज़मानत दे दी जाए, क्योंकि अभियोजन पक्ष इन ज़मानतों का विरोध करने में असमर्थ है। दूसरा विकल्प यह है कि इन मामलों को फिर से टाल दिया जाए और इनके लंबित रहने की अवधि और बढ़ाई जाए। भले ही इन मामलों को टाल दिया जाए, लेकिन ऐसी कोई उम्मीद नहीं दिखती कि अगली तारीख पर जांच अधिकारी (IO) सरकारी वकील को समय पर जानकारी देंगे।"
आगे कहा गया,
"ऐसी स्थिति में मेरे पास संबंधित DCP को निर्देश देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा कि वे अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से पेश हों और इन ज़मानत याचिकाओं के संबंध में जांच एजेंसी का पक्ष सरकारी वकील को समझाएं।"
इसमें यह भी कहा गया कि अगर अगली तारीख पर संबंधित DCP पेश नहीं होते हैं या पहले से प्रॉसिक्यूटर को जानकारी नहीं देते हैं, तो यह मान लिया जाएगा कि राज्य दोनों आरोपियों को तुरंत ज़मानत पर रिहा करना चाहता है।
आदेश का पालन सुनिश्चित करने के लिए इसकी एक कॉपी पुलिस कमिश्नर को भेजने का निर्देश दिया गया।
Title: AJAY KUMAR v. STATE (NCT OF DELHI) & other connected matter


