अपराध की गंभीरता तेज़ी से सुनवाई के अधिकार को खत्म नहीं कर सकती: दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 साल जेल में रहने के बाद ज़मानत दी

Shahadat

5 Sept 2026 8:22 PM IST

  • अपराध की गंभीरता तेज़ी से सुनवाई के अधिकार को खत्म नहीं कर सकती: दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 साल जेल में रहने के बाद ज़मानत दी

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध की गंभीरता तेज़ी से सुनवाई की संवैधानिक गारंटी को खत्म नहीं कर सकती। कोर्ट ने एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत दी, जो दो नाबालिग बच्चों के अपहरण और हत्या के मामले में सुनवाई के दौरान 13 साल से ज़्यादा समय तक जेल में रहा था।

    जस्टिस मनोज जैन ने कहा कि आरोपी द्वारा काटी गई जेल की सज़ा "बहुत ज़्यादा, अनुचित और ज़्यादती भरी" थी। उन्होंने ज़ोर दिया कि आरोपों की गंभीरता आरोपी के तेज़ी से सुनवाई के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकती।

    कोर्ट ने कहा,

    "अपराध की गंभीरता अपने आप में तेज़ी से सुनवाई की संवैधानिक गारंटी को खत्म नहीं कर सकती और न ही उस पर हावी हो सकती है। भले ही न्याय की घड़ी अलग-अलग कारणों से अपनी गति से चले, लेकिन आज़ादी की घड़ी को हमेशा के लिए रोका नहीं जा सकता।"

    कोर्ट अमित कुमार की ज़मानत अर्जी पर सुनवाई कर रहा था। यह अर्जी 2013 में दर्ज FIR से जुड़ी है, जिसमें IPC की धाराओं 364A, 302, 201, 120B और 34 के तहत अपराधों का आरोप है।

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, कुमार ने तीन अन्य आरोपियों के साथ मिलकर आपराधिक साज़िश रची। इसके तहत 30 लाख रुपये की फिरौती के लिए पांच और सात साल के दो नाबालिग बच्चों का अपहरण किया गया। बाद में 2 मार्च 2013 को बच्चे मृत पाए गए।

    आरोप है कि कुमार इस घटना का मास्टरमाइंड है और शिकायतकर्ता के परिवार का दूर का रिश्तेदार है। अभियोजन पक्ष ने यह भी दावा किया कि मारे गए बच्चों में से एक का स्कूल बैग उसके पास से बरामद हुआ।

    अभियोजन पक्ष और शिकायतकर्ता दोनों ने अपराध की गंभीरता का हवाला देते हुए ज़मानत का विरोध किया। उन्होंने कहा कि सुनवाई अपने अंतिम चरण में है और अभियोजन पक्ष जल्द ही अपने सबूत पेश करना पूरा कर लेगा। अभियोजन पक्ष ने यह आशंका भी जताई कि ज़मानत पर रिहा होने पर कुमार भाग सकता है।

    राहत देते हुए कोर्ट ने कहा कि उसके सामने एक तरफ "लंबे समय तक जेल में रहने" और दूसरी तरफ मामले की "बहुत ज़्यादा गंभीरता" के कारण दुविधा थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि फरवरी 2022 में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह ट्रायल को जल्द-से-जल्द, यानी चार महीने के अंदर पूरा करने की पूरी कोशिश करे। हालांकि, तब से चार साल से ज़्यादा का समय बीत चुका था और ट्रायल अभी भी पूरा नहीं हुआ।

    कोर्ट ने कहा,

    "इस मामले में जेल में बिताया गया समय असल में बहुत ज़्यादा, अनुचित और गलत है।"

    कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि याचिकाकर्ता 13 साल से ज़्यादा समय से हिरासत में था, जो कि "काफी लंबा समय" है।

    कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि 34 साल के कुमार की उम्र गिरफ्तारी के समय लगभग 21 साल थी और उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।

    इसके बाद यह स्पष्ट करते हुए कि वह मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दे रहा है, कोर्ट ने उसे 25,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही राशि की दो स्थानीय ज़मानत भरने पर ज़मानत दी।

    कोर्ट ने कहा,

    "याचिकाकर्ता द्वारा जेल में बिताई गई बहुत लंबी अवधि और मामले में हुई अत्यधिक देरी को ध्यान में रखते हुए - और मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना - याचिकाकर्ता को ज़मानत दी जाती है..."

    Title: SHRI AMIT KUMAR@DABBOO v. STATE NCT OF DELHI

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