बिक्री समझौते के उल्लंघन पर बयाना राशि अपने आप जब्त नहीं हो जाती, विक्रेता को नुकसान साबित करना होगा: दिल्ली हाईकोर्ट

  • बिक्री समझौते के उल्लंघन पर बयाना राशि अपने आप जब्त नहीं हो जाती, विक्रेता को नुकसान साबित करना होगा: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि संपत्ति बेचने के समझौते के तहत दी गई बयाना राशि (अर्नेस्ट मनी), अनुबंध के उल्लंघन पर अपने आप जब्त नहीं हो जाती। इस राशि को अपने पास रखने को सही ठहराने के लिए विक्रेता को यह साबित करना होगा कि उसे नुकसान हुआ है।

    जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने दो दिवंगत संपत्ति विक्रेताओं के कानूनी प्रतिनिधियों द्वारा दायर अपील खारिज की। इन विक्रेताओं ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें एक संभावित खरीदार को बयाना राशि के रूप में दिए गए 4 लाख रुपये वापस करने का निर्देश दिया गया।

    कोर्ट ने कहा,

    "बिक्री समझौते के तहत दी गई बयाना राशि, अनुबंध के उल्लंघन पर अपने आप जब्त नहीं हो जाती। अनुबंध में लिखी गई राशि केवल मुआवजे की अधिकतम सीमा तय करती है। जो पक्ष इस राशि को अपने पास रखना चाहता है, उसे यह साबित करना होगा कि अनुबंध के उल्लंघन से उसे कानूनी नुकसान हुआ। जहां नुकसान को साबित किया जा सकता है, वहां उसे साबित करना जरूरी है।"

    यह विवाद दिल्ली के रमेश नगर में एक संपत्ति बेचने के समझौते से जुड़ा है, जो 21 जून 2008 को 40 लाख रुपये में तय हुआ था। खरीदार ने बयाना राशि के तौर पर 4 लाख रुपये दिए, और बाकी के 36 लाख रुपये 5 सितंबर 2008 को या उससे पहले चुकाने थे।

    समझौते के अनुसार, अगर खरीदार सौदा पूरा करने में विफल रहता है तो बयाना राशि जब्त की जा सकती थी। वहीं, अगर विक्रेता अपनी तरफ से चूक करते हैं, तो उन्हें खरीदार को बयाना राशि की दोगुनी रकम देनी होगी।

    बाद में खरीदार ने 8 लाख रुपये वापस पाने की मांग की। उसका आरोप था कि विक्रेता संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज सत्यापन के लिए उपलब्ध कराने में विफल रहे। दूसरी ओर, विक्रेताओं का तर्क था कि खरीदार बाकी की रकम चुकाने में विफल रहा, इसलिए वे बयाना राशि जब्त करने के हकदार हैं।

    विक्रेताओं ने यह भी दावा किया कि उन्हें नुकसान उठाना पड़ा है, क्योंकि वे एक दूसरी संपत्ति खरीदना चाहते थे, लेकिन वह सौदा पूरा नहीं हो सका। इस वजह से उन्हें उस सौदे में दी गई 4.60 लाख रुपये की बयाना राशि गंवानी पड़ी।

    ट्रायल कोर्ट ने खरीदार का वह दावा खारिज किया, जिसमें उसने बयाना राशि की दोगुनी रकम मांगी थी, लेकिन विक्रेताओं को निर्देश दिया कि वे खरीदार को मूल रूप से दी गई 4 लाख रुपये की बयाना राशि, ब्याज सहित वापस करें। व्यथित होकर विक्रेताओं के कानूनी प्रतिनिधियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    हाईकोर्ट ने 'इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872' की धारा 74 का हवाला दिया। यह धारा अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) टूटने की स्थिति में उचित मुआवजे का प्रावधान करती है, खासकर तब जब अनुबंध में कोई निश्चित राशि देने की बात कही गई हो या कोई जुर्माना (पेनल्टी) तय किया गया हो।

    'फतेह चंद बनाम बालकिशन दास' और 'कैलाश नाथ एसोसिएट्स बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण' मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का आधार लेते हुए कोर्ट ने दोहराया कि अनुबंध में तय की गई राशि केवल इसलिए अपने आप वसूल करने योग्य नहीं हो जाती कि अनुबंध टूट गया।

    इस मामले में विक्रेताओं का दावा था कि उन्हें एक अन्य प्रॉपर्टी सौदे में दिए गए 4.60 लाख रुपये का नुकसान हुआ, क्योंकि खरीदार अपनी जिम्मेदारियां पूरी करने में विफल रही। हालांकि, जब विक्रेता मूल दस्तावेज पेश नहीं कर पाए, तो संबंधित रसीद और बिक्री समझौते (एग्रीमेंट टू सेल) को साक्ष्य के रूप में हटा दिया गया।

    कोर्ट ने पाया कि न तो उस दूसरे सौदे को साबित करने के लिए और न ही उसके पूरा न होने के कारणों को स्पष्ट करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश किया गया। चूंकि कथित नुकसान को दस्तावेजी सबूतों के जरिए या दूसरे विक्रेता से पूछताछ करके साबित किया जा सकता था, इसलिए विक्रेता अपने दावे के अनुसार नुकसान को साबित करने में विफल रहे।

    इस प्रकार, कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट का रिफंड (पैसे की वापसी) का आदेश देना सही था और अपील खारिज की।

    Case Title : Sh. Somnath Kharbanda, (Since Deceased) Through His Lrs. v. Smt. Arvinder Kaur, (Since Deceased) Through Her Lrs

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