फोरेंसिक सबूतों ने पीड़िता के बयान को पूरी तरह गलत साबित किया: दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 साल बाद रेप की सज़ा रद्द की

  • फोरेंसिक सबूतों ने पीड़िता के बयान को पूरी तरह गलत साबित किया: दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 साल बाद रेप की सज़ा रद्द की

    दिल्ली हाईकोर्ट ने व्यक्ति को रेप के मामले में 2013 में सुनाई गई सज़ा रद्द की। कोर्ट ने पीड़िता के बयान में अहम विसंगतियां और उसके बयान तथा मेडिकल, फोरेंसिक और दस्तावेज़ी सबूतों के बीच विरोधाभास पाया।

    जस्टिस विमल कुमार यादव उस अपील पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें एक व्यक्ति को IPC की धारा 363, 368 (अपहरण) के साथ धारा 366, 376 (रेप) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दोषी ठहराया गया और सात साल की कठोर कैद की सज़ा सुनाई गई।

    अभियोजन पक्ष का आरोप था कि व्यक्ति पीड़िता को दिल्ली के एक बाज़ार से ज़बरदस्ती उत्तर प्रदेश ले गया, जहां उसे चार दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया और उसका यौन उत्पीड़न किया गया।

    कोर्ट ने पाया कि कथित यौन उत्पीड़न के मामले में अभियोजन पक्ष का केस मुख्य रूप से पीड़िता के बयान पर टिका था।

    कोर्ट ने कहा कि हालांकि रेप के मामले में सज़ा सिर्फ़ पीड़िता के बयान के आधार पर हो सकती है, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने इस सिद्धांत को गलत तरीके से समझा कि बिना पुष्टि वाले बयान के मामले में बयान की अपनी विश्वसनीयता की जांच करने की ज़रूरत नहीं है।

    कोर्ट को कथित अपहरण के मामले में अहम विरोधाभास मिले। जहां पीड़िता ने कहा कि घटना वाली जगह पर कोई भीड़ नहीं थी, वहीं अभियोजन पक्ष के एक अन्य गवाह ने बाज़ार में भीड़ होने की बात कही।

    कोर्ट ने घटना के बारे में पीड़िता के सबसे शुरुआती बयान पर भी गौर किया, जो उसने पुलिस सुरक्षा में रहते हुए और आरोपी की अनुपस्थिति में एक स्वतंत्र मेडिकल अधिकारी को दिया। उसने कहा कि वह माता-पिता के दबाव के कारण घर से निकली थी, उसके साथ कोई शारीरिक या यौन उत्पीड़न नहीं हुआ था और वह खुद वापस आ गई।

    इसके अलावा, पीड़िता ने कहा कि कथित उत्पीड़न के दौरान उसके कपड़े खून से सने हुए थे। हालांकि, फोरेंसिक रिपोर्ट में उसके कपड़ों पर कोई खून नहीं मिला।

    इस प्रकार कोर्ट ने ज़ोर दिया कि यह "सिर्फ़ पुष्टि के अभाव का मामला नहीं था, बल्कि वैज्ञानिक सबूतों द्वारा अहम बिंदु पर प्रत्यक्षदर्शी के बयान के सीधे विरोधाभास का मामला था।" इस प्रकार, कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों को समझने में "स्पष्ट गलती" की थी और दोषसिद्धि रद्द की।

    Case title: Shahbuddin v. State

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