वैवाहिक घर में हर असंवेदनशील या आपत्तिजनक हरकत 'क्रूरता' नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
2 Oct 2026 9:19 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक घर में होने वाली हर असंवेदनशील या आपत्तिजनक हरकत अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत 'क्रूरता' नहीं मानी जा सकती।
जस्टिस मधु जैन ने यह टिप्पणी महिला की याचिका खारिज करते हुए की। महिला ने रिविजनल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके ससुराल वालों को IPC की धारा 498A (क्रूरता) और 406 (भरोसे का आपराधिक उल्लंघन) के आरोपों से बरी कर दिया गया, जबकि उसके पति के खिलाफ क्रूरता का आरोप बरकरार रखा गया।
कोर्ट ने कहा कि जब पति के कई रिश्तेदारों पर मुकदमा चलाने की कोशिश की जाती है तो शिकायत की जांच करके यह पता लगाना ज़रूरी है कि क्या उसमें कथित घटनाओं में उनकी भूमिका का ज़िक्र है या नहीं।
कोर्ट ने कहा,
"नीलू चोपड़ा बनाम भारती और कहकशां कौसर बनाम बिहार राज्य के मामलों में दी गई चेतावनी कोर्ट को केवल इसलिए वैवाहिक शिकायत पर अविश्वास करने की इजाज़त नहीं देती, क्योंकि परिवार के कई सदस्यों के नाम उसमें शामिल हैं। हालांकि, यह कोर्ट से अपेक्षा करता है कि वह किसी खास व्यक्ति की भूमिका के आरोप और पूरे परिवार पर बिना सोचे-समझे लगाए गए सामूहिक आरोपों के बीच अंतर करे।"
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों से संबंधित आरोपियों के ऐसे आचरण का पता चलना चाहिए, जो कानून के प्रावधान के तहत 'क्रूरता' की श्रेणी में आते हों।
ट्रायल कोर्ट ने महिला के ससुर, सास और दो ननदों को आरोपों से बरी किया था। महिला का आरोप था कि उसके ससुराल वालों ने 5 लाख रुपये और मारुति एस्टीम कार की मांग को लेकर उसे परेशान किया और उसके साथ शारीरिक व मौखिक दुर्व्यवहार किया।
उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके पति ने उसे अपने बैंक खाते से पैसे निकालने और अपनी कमाई उसे सौंपने के लिए मजबूर किया।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि गर्भावस्था के दौरान महिला को दवाएं दी गईं और उसे उचित मेडिकल सहायता नहीं दी गई, जिसके कारण उसका गर्भपात हो गया।
कोर्ट ने गौर किया कि पति के खिलाफ लगाए गए आरोपों में शारीरिक मारपीट, पैसे निकालना और लेना, तथा मेडिकल सहायता देने से इनकार करने जैसी विशिष्ट घटनाएं शामिल थीं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि दूसरे रिश्तेदारों पर लगाए गए आरोप मुख्य रूप से सामूहिक थे और उनमें उनके अलग-अलग कामों की ठीक से पहचान नहीं की गई।
कोर्ट ने यह भी देखा कि महिला की शारीरिक हालत के बावजूद उससे घर का काम करवाने के बारे में सास पर लगाया गया आरोप, उस समय दहेज की मांग से जुड़ा नहीं है।
ननदों के बारे में कोर्ट ने कहा कि महिला के रूप-रंग और दहेज को लेकर ताने मारने के आरोप मुख्य रूप से परिवार के खिलाफ सामूहिक आरोपों का हिस्सा थे।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए IPC की धारा 498-A के तहत प्रतिवादी नंबर 4 से 6 को आरोपमुक्त करने के फैसले को गलत या पूरी तरह से गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता, जिसके लिए निगरानी के अधिकार का इस्तेमाल किया जाए। प्रतिवादी नंबर 3 के खिलाफ कार्यवाही उनकी मौत के कारण पहले ही खत्म हो चुकी है और उनके संबंध में आगे किसी फैसले की जरूरत नहीं है।"
IPC की धारा 406 के बारे में कोर्ट ने कहा कि शिकायत में यह नहीं बताया गया कि किस आरोपी ने मांग पर क्या प्रतिक्रिया दी या उनमें से किसी ने बेईमानी से उस सामान को कैसे अपने कब्जे में लिया, इस्तेमाल किया, बेच दिया या अपने पास रखा, जिसके बारे में कहा गया कि वह उनके कब्जे में था।
कोर्ट ने आगे कहा कि साझा वैवाहिक घर में संपत्ति का मौजूद होना, बिना इस बात के सबूत के कि वह संपत्ति किसी खास व्यक्ति को सौंपी गई। बाद में उसके साथ बेईमानी की गई, अपने आप में घर के हर सदस्य के खिलाफ 'आपराधिक विश्वासघात' (Criminal Breach of Trust) नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए IPC की धारा 406 के तहत आरोपियों को आरोपमुक्त करने के फैसले में ऐसी कोई बड़ी गैर-कानूनी बात या गलती नहीं है, जिसके लिए निगरानी के अधिकार का इस्तेमाल किया जाए। नतीजतन, आदेश के उस हिस्से को चुनौती देने वाली याचिका भी खारिज की जाती है।"
कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि रिविजनल कोर्ट का पति के खिलाफ आरोपों और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ आरोपों में अंतर करने का फैसला रिकॉर्ड के आधार पर एक उचित नजरिया है।
Case Title : X v. STATE & ORS

