ड्यूटी पर मारे गए ड्राइवर को मुआवज़ा पाने का हक, बशर्ते हत्या निजी और जान-बूझकर न की गई हो: दिल्ली हाईकोर्ट

Shahadat

27 May 2026 6:41 PM IST

  • ड्यूटी पर मारे गए ड्राइवर को मुआवज़ा पाने का हक, बशर्ते हत्या निजी और जान-बूझकर न की गई हो: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ट्रक ड्राइवर के परिवार को दिए गए मुआवज़े को सही ठहराया। इस ड्राइवर की ड्यूटी के दौरान कुछ अज्ञात हमलावरों ने हत्या कर दी थी। कोर्ट ने माना कि यह घटना 'कर्मचारी मुआवज़ा अधिनियम, 1923' के तहत रोज़गार के दौरान और उससे जुड़ी एक "आकस्मिक मृत्यु" थी।

    जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने यह फ़ैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी और नियोक्ता द्वारा दायर उन अपीलों को खारिज किया, जिनमें मृतक ड्राइवर के कानूनी वारिसों को मुआवज़ा देने के आदेश को चुनौती दी गई।

    कोर्ट ने दावा करने वालों द्वारा दायर अलग याचिका को भी खारिज किया, जिसमें मुआवज़े की राशि बढ़ाने की मांग की गई।

    दावा करने वालों के अनुसार, मृतक कंपनी में ड्राइवर के तौर पर काम करता था और एक वैध पॉलिसी के तहत बीमित ट्रक चला रहा था। जिस रात यह घटना हुई, उस रात ड्यूटी पर रहते हुए कथित तौर पर कुछ अज्ञात लोगों ने उस पर हमला किया। बाद में चोटों के कारण उसकी मौत हो गई।

    बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि यह मामला "सीधी-सादी हत्या" (murder simpliciter) का है, न कि किसी दुर्घटना का। कंपनी ने दलील दी कि जान-बूझकर की गई हत्या के मामलों में 'कर्मचारी मुआवज़ा अधिनियम' के तहत मुआवज़ा नहीं दिया जा सकता।

    नियोक्ता ने भी अपनी ज़िम्मेदारी से इनकार करते हुए तर्क दिया कि यह मौत रोज़गार के दौरान नहीं हुई।

    इन तर्कों को खारिज करते हुए कोर्ट ने पाया कि गवाहों की गवाही और नियोक्ता के निदेशक द्वारा दी गई स्वीकारोक्तियों से नियोक्ता और कर्मचारी के बीच का संबंध स्पष्ट रूप से स्थापित होता है।

    इस सवाल पर कि क्या इस हत्या को 'आकस्मिक मृत्यु' माना जा सकता है, कोर्ट ने 'रीता देवी बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2000)' मामले का हवाला दिया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने "सीधी-सादी हत्या" और "आकस्मिक हत्या" के बीच अंतर स्पष्ट किया था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को जान से मारने का मुख्य इरादा किसी खास व्यक्ति को ही मारना हो तो वह कृत्य "सीधी-सादी हत्या" माना जाएगा। हालांकि, यदि हत्या किसी अन्य आपराधिक कृत्य को अंजाम देने के दौरान होती है, तो उसे "आकस्मिक हत्या" माना जा सकता है।

    कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के पिछले फ़ैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें यह माना गया कि ड्यूटी निभाते समय हमला झेलने वाले ड्राइवरों के मामले भी "रोज़गार के दौरान और उससे उत्पन्न" होने वाली घटनाओं की श्रेणी में ही आएंगे।

    मौजूदा मामले में कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि मृतक को किसी निजी रंजिश या मकसद के चलते जान-बूझकर निशाना बनाया गया था। इसके विपरीत, वह उस जगह पर केवल अपने रोज़गार से जुड़ी ज़िम्मेदारियों के कारण ही मौजूद था।

    अदालत ने कहा,

    “ऐसा कोई भी विश्वसनीय सबूत न होने पर, जिससे यह साबित हो सके कि मृतक की मौत महज़ एक हत्या थी, इस घटना को सही तौर पर एक दुर्घटना-जनित हत्या माना गया।”

    इस आधार पर अदालत ने कमिश्नर के उस निर्देश को बरकरार रखा, जिसमें बीमा कंपनी को मुआवज़े के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया, जबकि नियोक्ता को 'कर्मचारी मुआवज़ा अधिनियम' के तहत जुर्माने के भुगतान के लिए ज़िम्मेदार माना गया।

    Case title: M/S National Insurance Co Ltd v. Sunita Devi & Ors

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