कुत्तों का गोद लेने वाले मालिकों के साथ भावनात्मक रिश्ता नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
Shahadat
17 April 2026 10:20 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि जानवरों की कस्टडी को बेजान चीज़ों की संपत्ति के बराबर नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ऐसे विवादों का फैसला करते समय पालतू जानवरों और उनकी देखभाल करने वालों के बीच के भावनात्मक रिश्ते को पूरा महत्व दिया जाना चाहिए।
जस्टिस गिरीश कथपालिया ने इस तरह तीन बचाए गए पालतू कुत्तों को उनके गोद लेने वाले मालिकों को लौटाने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि इन कुत्तों को उनके मालिकों से अलग करने पर उन्हें गहरा भावनात्मक आघात पहुंचेगा।
यह फैसला एक याचिका पर आया, जिसमें ट्रायल कोर्ट के उन आदेशों को चुनौती दी गई, जिनमें कुत्तों को 'सुपरदारी' (अस्थायी कस्टडी) पर उस व्यक्ति को सौंपने का निर्देश दिया गया, जो खुद को उनका असली मालिक बता रहा था।
इन कुत्तों को पहले कथित क्रूरता के मामले में की गई एक छापेमारी के दौरान बचाया गया। इसके बाद उन्हें एक NGO को सौंप दिया गया, जिसने याचिकाकर्ताओं द्वारा उन्हें गोद लेने में मदद की।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जानवरों की कस्टडी का मामला बेजान चीज़ों की कस्टडी के मामले से बिल्कुल अलग है।
कोर्ट ने कहा,
"कोई भी उस भावनात्मक रिश्ते को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता, जो पालतू जानवर को गोद लेने वाले व्यक्ति और उस पालतू जानवर के बीच बन जाता है। इस समय इस कोर्ट के सामने यह मुद्दा नहीं है कि मौजूदा प्रतिवादी नंबर 3 कुत्तों के साथ क्रूरता कर रहा था या नहीं; यह मामला ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। इस समय इस कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा वह भावनात्मक आघात है, जिससे ये बेज़ुबान जानवर अपने गोद लेने वाले मालिकों (याचिकाकर्ताओं) से अलग होने के बाद गुज़र रहे होंगे।"
प्रतिवादी, जिसने कुत्तों पर अपना मालिकाना हक जताया था, कुत्तों को याचिकाकर्ताओं को लौटाने पर सहमत हो गया। लेकिन उसने यह शर्त रखी कि अगर अंततः वह संबंधित आपराधिक मामले में बरी हो जाता है, तो कुत्तों की कस्टडी उसे वापस सौंप दी जाए।
तदनुसार, हाईकोर्ट ने विवादित आदेशों में संशोधन करते हुए निर्देश दिया कि कुत्तों को जांच अधिकारी के माध्यम से याचिकाकर्ताओं को सौंप दिया जाए।
Case title: Mr. Sunil Malhotra & Ors. v. State

