DNA से सिर्फ़ सेक्सुअल संबंध का पता चलता है, आपसी सहमति से रिश्ता के होने का नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने रेप मामले में बरी का फ़ैसला बरकरार रखा
Shahadat
4 Sept 2026 6:34 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि DNA सबूत से आरोपी और पीड़िता के बीच सेक्सुअल संबंध की पुष्टि तो होती है, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि रिश्ता आपसी सहमति से था या बिना सहमति के।
जस्टिस मधु जैन ने यह टिप्पणी एक ऐसे व्यक्ति को बरी करने का फ़ैसला बरकरार रखते हुए की, जिस पर एक महिला का बार-बार यौन शोषण करने, उसे नशीला पदार्थ देने, धमकाने और अप्राकृतिक यौन कृत्य करने का आरोप था।
कोर्ट ने गौर किया कि मामले की DNA रिपोर्ट से यह साबित हुआ कि आरोपी पीड़िता से पैदा हुए बच्चे का बायोलॉजिकल पिता है। हालांकि, कोर्ट ने माना कि ऐसे सबूत से अकेले यह तय नहीं किया जा सकता कि सेक्सुअल संबंध किन हालात में बने थे।
कोर्ट ने कहा,
"यह सबूत निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे दोनों पक्षों के बीच सेक्सुअल संबंध होने की बात साबित होती है। हालांकि, DNA रिपोर्ट से अकेले यह पता नहीं चलता कि संबंध किन हालात में बने थे, और न ही इससे यह तय होता है कि रिश्ता आपसी सहमति से था या बिना सहमति के।"
कोर्ट पीड़िता द्वारा दायर उस अपील पर सुनवाई कर रहा था, जो अक्टूबर 2024 में ट्रायल कोर्ट के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ थी, जिसमें आरोपी को IPC की धाराओं 328, 376(2)(n), 377, 506 और 509 के तहत अपराधों से बरी कर दिया गया।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी परिवार का परिचित है। उसने 2017 से पीड़िता की मर्ज़ी के बिना, उसे धमकाकर और लालच देकर शारीरिक संबंध बनाए।
यह भी आरोप लगाया गया कि एक बार उसने पीड़िता का यौन शोषण करने से पहले उसे नशीला पदार्थ दिया। इसके बाद पीड़िता गर्भवती हो गई और जून 2019 में उसने एक बच्चे को जन्म दिया।
जांच के दौरान पीड़िता, आरोपी और बच्चे के DNA सैंपल लिए गए और फ़ोरेंसिक रिपोर्ट से साबित हुआ कि आरोपी बच्चे का बायोलॉजिकल पिता है।
आरोपी ने CrPC की धारा 313 के तहत अपने बयान में माना कि उसके पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध थे, लेकिन दावा किया कि रिश्ता आपसी सहमति से था और पीड़िता के पति को इसकी जानकारी थी।
अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के सबूतों की जांच सिर्फ़ पीड़िता और आरोपी के बीच यौन संबंध होने के तथ्य के आधार पर ही नहीं की, बल्कि उन हालात को भी देखा, जिनमें कथित तौर पर संबंध बने थे और यह भी देखा कि क्या अभियोजन पक्ष ने बिना सहमति, जबरदस्ती, नशे की हालत और धमकी के आरोपों को बिना किसी शक के साबित किया।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि ट्रायल कोर्ट ने महिला के बयान को सिर्फ़ इसलिए खारिज नहीं किया कि वह पीड़िता का बयान था, बल्कि उसके पहले के बयानों और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सबूतों के आधार पर उसकी जांच की, जिसके बाद उसमें अहम विसंगतियां और बदलाव पाए गए।
जस्टिस जैन ने गौर किया कि कथित पहली घटना के दौरान पीड़िता की होश की हालत को लेकर अहम विसंगति थी, जिसमें उसने आरोप लगाया कि वह नशे में थी।
कोर्ट ने कहा,
"यह विसंगति इसलिए अहम हो जाती है, क्योंकि अभियोजन पक्ष खुद पहली घटना के दौरान सहमति न होने की वजह नशीला पदार्थ दिए जाने और उसके कारण पीड़िता की हालत को बताता है।"
कोर्ट ने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट ने गर्भावस्था और बच्चे के पिता कौन है, इस बारे में कथित शक से जुड़ी अहम विसंगतियों पर भी गौर किया।
कोर्ट ने कहा कि वह इस बात से वाकिफ है कि यौन अपराध के मामले में पीड़िता के व्यवहार को इस आधार पर नहीं आंका जा सकता कि उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए, और न ही यौन अपराध की रिपोर्ट करने में देरी को ही अभियोजन पक्ष के मामले को खारिज करने के लिए काफी माना जा सकता है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कोर्ट को अलग-अलग बयानों की विश्वसनीयता तय करनी हो और यह देखना हो कि क्या अभियोजन पक्ष ने आरोपों को बिना किसी शक के साबित किया तो पक्षों का व्यवहार और आसपास के हालात पूरी तरह से अप्रासंगिक नहीं होते।
मौजूदा मामले में कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने किसी एक हालात को निर्णायक नहीं माना, बल्कि सबूतों पर कुल मिलाकर विचार किया।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए यह मामला ऐसा नहीं है, जहां अहम सबूतों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया हो या बरी करने का नतीजा साफ तौर पर गलत हो। ट्रायल कोर्ट ने सबूतों की जांच की है। ऐसे नतीजे पर पहुंचा है जो उसके सामने मौजूद सामग्री के आधार पर उचित रूप से संभव है।"
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि कोई दूसरा नजरिया भी संभव हो सकता है, यह बरी करने के फैसले के खिलाफ अपील में दखल देने को सही ठहराने के लिए काफी नहीं है, इसलिए आरोपी के पक्ष में निर्दोष होने की मजबूत धारणा उसके हक में काम करती है।
Title: KXXXXX v. THE STATE GOVT. OF NCT OF DELHI & ANR


