महिला पर भी गैंगरेप का आरोप तय हो सकता है, खुद रेप करना जरूरी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

  • महिला पर भी गैंगरेप का आरोप तय हो सकता है, खुद रेप करना जरूरी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी महिला के खिलाफ भी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376D और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 70 के तहत गैंगरेप का आरोप तय किया जा सकता है, भले ही उसने खुद पीड़िता के साथ शारीरिक रूप से रेप न किया हो।

    जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने कहा कि गैंगरेप से संबंधित प्रावधानों में इस्तेमाल किए गए शब्द 'व्यक्ति' (Persons) को केवल पुरुषों तक सीमित नहीं किया जा सकता। इस अपराध के लिए आरोपी का लिंग निर्णायक नहीं है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके सामने सवाल यह था कि क्या किसी महिला पर गैंगरेप का आरोप लगाया जा सकता है। अदालत ने इस सवाल पर कोई राय नहीं दी कि क्या कोई महिला IPC की धारा 375 या BNS की धारा 63 के तहत स्वतंत्र रूप से रेप का अपराध कर सकती है।

    क्या कहा हाईकोर्ट ने?

    अदालत ने कहा कि कोई व्यक्ति भले ही व्यक्तिगत रूप से रेप की शारीरिक क्रिया में शामिल न हुआ हो, फिर भी IPC की धारा 376D या BNS की धारा 70 के तहत गैंगरेप का दोषी माना जा सकता है, यदि वह सामूहिक मंशा के तहत अपराध को अंजाम देने में शामिल रहा हो।

    हाईकोर्ट ने कहा कि गैंगरेप के अपराध के लिए यह जरूरी नहीं है कि सामूहिक मंशा के तहत काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति खुद शारीरिक रूप से रेप करे।

    उदाहरण देते हुए अदालत ने कहा कि कोई महिला उस समूह का हिस्सा नहीं भी हो सकती है, जो पीड़िता के साथ शारीरिक रूप से रेप करता है, लेकिन यदि उसने पीड़िता के साथ रेप कराने की साझा मंशा को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई है, तो उस पर गैंगरेप का आरोप लगाया जा सकता है।

    अदालत ने कहा कि 'एक या अधिक व्यक्तियों के समूह' में इस्तेमाल किए गए शब्द 'व्यक्ति' की व्याख्या केवल पुरुषों के समूह के रूप में नहीं की जा सकती। इसी तरह, 'साझा मंशा को आगे बढ़ाने' की अवधारणा को भी केवल पुरुषों तक सीमित नहीं किया जा सकता।

    2013 के आपराधिक कानून संशोधन का भी उल्लेख

    हाईकोर्ट ने कहा कि 2013 के आपराधिक कानून संशोधन के बाद गैंगरेप को IPC की धारा 376D के तहत एक अलग और स्वतंत्र अपराध के रूप में शामिल किया गया। बाद में BNS की धारा 70 में भी इसे बरकरार रखा गया।

    अदालत के अनुसार, गैंगरेप से संबंधित इन स्वतंत्र प्रावधानों की व्याख्या केवल रेप की परिभाषा तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

    कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि 2013 के संशोधन के बाद रेप की कानूनी परिभाषा का दायरा बढ़ाया गया, जिसे बाद में BNS में भी बरकरार रखा गया।

    हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई महिला अकेले गैंगरेप के अपराध के लिए आरोपित नहीं की जा सकती, क्योंकि इस अपराध के लिए समूह और साझा मंशा से जुड़ी कानूनी शर्तें आवश्यक हैं।

    कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसने IPC की धारा 375 या BNS की धारा 63 में रेप की परिभाषा के तहत इस्तेमाल किए गए शब्द 'पुरुष' को लैंगिक रूप से तटस्थ मानने के सवाल पर कोई राय नहीं दी है।

    POCSO एक्ट के तहत आरोप भी बरकरार

    यह टिप्पणी अदालत ने उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें एक महिला और एक अन्य आरोपी के खिलाफ विभिन्न प्रावधानों के तहत आरोप तय करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।

    महिला ने तर्क दिया था कि रेप की वैधानिक परिभाषा में अपराध करने वाले व्यक्ति के लिए 'पुरुष' शब्द का इस्तेमाल किया गया है, इसलिए उस पर गैंगरेप का आरोप नहीं लगाया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धारा 6 के तहत तय आरोप को भी बरकरार रखा।

    इस संबंध में अदालत ने अपने पहले के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि POCSO एक्ट के तहत गंभीर प्रवेशनकारी यौन हमले का अपराध लैंगिक रूप से तटस्थ है।

    अंततः हाईकोर्ट ने 17 जनवरी 2025 को ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आरोप तय करने के आदेश को बरकरार रखा और महिला की याचिका खारिज कर दी।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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