दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामले में आरोप तय होने से पहले मंज़ूरी देने वाले अधिकारी को बुलाने का फ़ैसला सही ठहराया
Shahadat
25 March 2026 7:16 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामले में आरोप तय होने से पहले (प्री-चार्ज स्टेज) मंज़ूरी देने वाले अधिकारी को बुलाने के फ़ैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि जहां तथ्यों की ज़रूरत हो, वहां ट्रायल शुरू होने से पहले मंज़ूरी की वैधता की जाँच करने से अदालतों को रोका नहीं जा सकता।
जस्टिस अमित महाजन ने इस तरह राज्य सरकार की याचिका खारिज की, जिसमें स्पेशल जज के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें आरोपी को CrPC की धारा 311 के तहत मंज़ूरी देने वाले अधिकारी को बुलाने की इजाज़त दी गई ताकि उसके मुक़दमे के लिए दी गई मंज़ूरी की वैधता की जांच की जा सके।
बेंच ने टिप्पणी की,
“भले ही राज्य सरकार की इस दलील में कुछ दम है कि मंज़ूरी की वैधता की जांच का सही समय ट्रायल के दौरान होता है, न कि ट्रायल से पहले [संदर्भ: CBI बनाम अशोक कुमार अग्रवाल (उपरोक्त)], फिर भी, ट्रायल से पहले इस मुद्दे पर विचार करने पर कोई रोक नहीं है। अगर तथ्यों की ज़रूरत हो, तो इस मुद्दे का फ़ैसला शुरुआत में ही किया जा सकता है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि आरोपों पर दलीलें सुनने में स्वाभाविक रूप से जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूतों का पहली नज़र में मूल्यांकन शामिल होता है।
कोर्ट ने आगे कहा,
“मंज़ूरी की प्रामाणिकता भी एक ज़रूरी तथ्य है, जिस पर माननीय स्पेशल जज को विचार करना चाहिए, क्योंकि इसका असर आरोपी पर मुक़दमा चलाने की कोर्ट की क्षमता पर पड़ता है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि CrPC की धारा 311 अदालतों को जांच या ट्रायल के “किसी भी चरण” पर गवाहों को बुलाने या उनकी जांच करने के व्यापक अधिकार देती है। अगर कोई सही फ़ैसला लेने के लिए ज़रूरी हो, तो इस अधिकार का इस्तेमाल ट्रायल से पहले भी किया जा सकता है।
तथ्यों के अनुसार, शुरू में सबूतों की कमी के कारण आरोपी के खिलाफ़ कोई मंज़ूरी नहीं मांगी गई और उसे चार्जशीट के कॉलम 12 में रखा गया। बाद में जब एक सह-आरोपी के खिलाफ़ आरोपों पर दलीलों के दौरान स्पेशल जज ने कुछ टिप्पणियां कीं, तब जाकर उसके खिलाफ़ मंज़ूरी हासिल की गई।
इस पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी को यह “जायज़ आशंका” थी कि मंज़ूरी बिना सोचे-समझे (बिना दिमाग़ लगाए) दी गई।
आगे कहा गया,
“आरोपी – विक्रम सिंह मीना का मामला मुख्य रूप से इस तर्क पर आधारित है कि उनके विरुद्ध दी गई मंज़ूरी कानून की दृष्टि से मान्य नहीं है, क्योंकि यह मंज़ूरी पूरी तरह से माननीय स्पेशल जज के निर्देश पर दी गई, जिसके परिणामस्वरूप, प्रशासनिक प्राधिकारी से अपने विवेक का प्रयोग करने का अधिकार छीन लिया गया।”
तदनुसार, कोर्ट ने राज्य की याचिका खारिज की।
Case title: State v. Vikram Singh Meena

