₹1,000 की रिश्वत: दिल्ली हाईकोर्ट ने 32 साल पुराने मामले में पुलिस कांस्टेबल की सज़ा रखी बरकरार
Shahadat
28 April 2026 9:38 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत पुलिस कांस्टेबल की सज़ा बरकरार रखी। कांस्टेबल पर 1994 में ₹1,000 की रिश्वत मांगने और लेने का आरोप था। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने गैर-कानूनी तरीके से पैसे मांगने और लेने, दोनों ही बातों को सफलतापूर्वक साबित किया था।
जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने आरोपी की अपील खारिज की, जिसमें उसने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13 के तहत अपनी सज़ा और दोषसिद्धि को चुनौती दी थी।
ट्रायल कोर्ट ने उसे हर आरोप के लिए एक साल की कठोर कारावास की सज़ा सुनाई थी। साथ ही जुर्माना भी लगाया था। ये दोनों सज़ाएं एक साथ चलनी थीं।
अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, महरौली पुलिस स्टेशन में तैनात कांस्टेबल ने शिकायतकर्ता से उसका पहचान पत्र (ID card) लौटाने के लिए ₹1,000 की मांग की थी। यह पहचान पत्र पुलिस की चेकिंग के दौरान ज़ब्त किया गया। भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (Anti-Corruption Branch) ने एक जाल बिछाया, जिसमें आरोपी को रिश्वत की रकम लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया गया।
हाईकोर्ट के सामने यह दलील दी गई कि आरोपी की सज़ा को बरकरार नहीं रखा जा सकता, क्योंकि सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता की गवाही नहीं ली गई। बार-बार समन भेजने के बावजूद शिकायतकर्ता का कोई पता नहीं चल पाया था।
इस दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर गैर-कानूनी तरीके से पैसे मांगने और लेने की बात दूसरे भरोसेमंद सबूतों से साबित हो जाती है, तो शिकायतकर्ता की गवाही न होना कोई बड़ी कमी नहीं मानी जाएगी।
कोर्ट ने 'नीरज दत्ता बनाम राज्य (दिल्ली सरकार)' (2023) मामले का हवाला दिया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर शिकायतकर्ता/मुखबिर उपलब्ध नहीं है, या उसकी मौत हो चुकी है, या वह अपने बयान से पलट जाता है (होस्टाइल हो जाता है), तब भी गैर-कानूनी तरीके से पैसे मांगने की बात दूसरे गवाहों की गवाही, दस्तावेज़ी सबूतों, या यहां तक कि परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर भी साबित की जा सकती है।
कोर्ट ने पाया कि 'पंच गवाह' (स्वतंत्र गवाह) की गवाही से रिश्वत मांगने और लेने की बात साफ तौर पर साबित हो गई। साथ ही उस गवाह पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं था।
कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंज़ूरी (Sanction) को दी गई चुनौती को भी खारिज किया। कोर्ट ने माना कि अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (Additional Deputy Commissioner of Police) के पास मुकदमा चलाने की मंज़ूरी देने का पूरा अधिकार था, क्योंकि उनके पास ही आरोपी को नौकरी से हटाने की शक्ति थी।
ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कमी न पाते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज की और उसकी सज़ा बरकरार रखी।
Case title: Const. Satish Kumar v. State Of Delhi

