दिल्ली हाईकोर्ट ने सोनम वांगचुक की मेडिकल रिपोर्ट मांगी, प्राइवेट हॉस्पिटल में शिफ्ट करने पर डॉक्टरों की बात सुनी जाएगी
Shahadat
20 July 2026 5:20 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक से जुड़ी सभी मेडिकल रिपोर्ट मांगीं और सफदरजंग अस्पताल और AIIMS के डॉक्टरों को निर्देश दिया कि वे उनकी पसंद के प्राइवेट अस्पताल में शिफ्ट होने की अर्ज़ी पर फ़ैसला लेने से पहले कोर्ट की मदद करें।
चीफ़ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीज़न बेंच ने ये निर्देश तब दिए, जब वे वांगचुक की पत्नी डॉ. गीतांजलि आंग्मो की अपील पर सुनवाई कर रहे थे। यह अपील सफदरजंग अस्पताल से उन्हें शिफ्ट करने की इजाज़त न देने वाले सिंगल जज के आदेश के ख़िलाफ़ दायर की गई।
बेंच ने निर्देश दिया कि सफदरजंग अस्पताल, AIIMS और प्राइवेट लैब द्वारा एनालाइज़ किए गए सैंपल पर आधारित सभी पैथोलॉजिकल रिपोर्ट हलफ़नामे के ज़रिए रिकॉर्ड पर रखी जाएं। बेंच ने AIIMS के डायरेक्टर-इन-चार्ज और संस्थान में इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. अक्षय से भी अगली सुनवाई में मौजूद रहने का अनुरोध किया। साथ ही वांगचुक के परिवार द्वारा कंसल्ट किए गए डॉक्टर को भी बुलाया।
अब इस मामले की सुनवाई मंगलवार को दोपहर 12:30 बजे होगी।
वांगचुक को 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस जंतर-मंतर से ले गई, जहां वह कॉकरोच जनता पार्टी और NEET पेपर लीक के ख़िलाफ़ विरोध कर रहे छात्रों के समर्थन में भूख हड़ताल पर बैठे थे। 16 जुलाई को इसी डिवीज़न बेंच ने केंद्र को निर्देश दिया था कि उनकी रोज़ाना क्लिनिकल मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाए और ज़रूरत पड़ने पर इलाज मुहैया कराया जाए, जिसके बाद उन्हें मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए सफदरजंग अस्पताल शिफ्ट किया गया था।
उनकी पत्नी की उन्हें प्राइवेट अस्पताल में शिफ्ट करने की अंतरिम अर्ज़ी को रविवार को एक सिंगल जज ने खारिज कर दिया था।
आंग्मो की ओर से पेश होते हुए सीनियर एडवोकेट अखिल सिब्बल ने तर्क दिया कि वांगचुक को बिना किसी पूर्व सूचना और बिना किसी ऐसी मेडिकल रिपोर्ट के विरोध स्थल से हटाया गया जो किसी इमरजेंसी स्थिति का संकेत देती हो।
सिब्बल ने कहा,
"यह कथित तौर पर आपके (कोर्ट के) आदेश की आड़ में किया गया।"
उन्होंने तर्क दिया कि न तो वांगचुक और न ही उनके परिवार को उन मेडिकल रिपोर्ट की कॉपी दी गई जिनमें कथित तौर पर उनके पोटैशियम लेवल में गिरावट दिखाई गई थी।
सिब्बल ने कहा,
"मेरा कहना है कि कृपया उनकी सहमति के बिना उन्हें कुछ भी न दिया जाए। हमें कोई रिपोर्ट नहीं दी गई है। हमें केवल ज़ुबानी तौर पर पोटैशियम के लेवल के बारे में बताया गया।"
सिब्बल ने दलील दी कि वांगचुक होश में थे और उन्हें सब पता था और नई रिपोर्टों से पता चला कि उनका पोटेशियम लेवल नॉर्मल रेंज में था। उन्होंने आगे कहा कि वांगचुक ने अस्पताल को पत्र लिखकर जाने और महीने भर चले विरोध प्रदर्शन के समापन में शामिल होने की अनुमति मांगी थी। हालाँकि, उनकी मांग नहीं मानी गई।
वांगचुक की स्वायत्तता (Autonomy) के दायरे पर सवाल उठाते हुए सिब्बल ने तर्क दिया:
"किसी ऐसे व्यक्ति के पास क्या स्वायत्तता है जो गिरफ्तार या हिरासत में नहीं है, यह तय करने के मामले में कि क्या मेडिकल देखरेख स्वीकार की जाए और किस अस्पताल से? क्या उसे किसी जगह पर रहने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए और जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए? यदि व्यक्ति होश में है, लिखने में सक्षम है और अभी तक जीवन के लिए खतरा वाली स्थिति में नहीं है, तो क्या ऐसी बात उचित है?"
'कॉमन कॉज़' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए, सिब्बल ने कहा कि जब कोई व्यक्ति होश में हो और निर्णय लेने में सक्षम हो, तो शारीरिक स्वायत्तता और सूचित सहमति (Informed Consent) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस मोड़ पर कोर्ट ने पूछा,
"ये रिपोर्ट डॉक्टरों द्वारा तैयार की गईं। क्या डॉक्टर को मरीज के आईसीयू में ले जाए जाने का इंतजार करना चाहिए और तभी दवा देनी चाहिए?"
सिब्बल ने स्पष्ट किया कि शिकायत मेडिकल इलाज के खिलाफ नहीं थी, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया के आसपास पारदर्शिता की कमी के खिलाफ थी।
उन्होंने कहा,
"भरोसे की कमी है।"
इसके बाद कोर्ट ने टिप्पणी की कि रिपोर्ट परिवार के साथ साझा की जानी चाहिए थी, लेकिन उसने परिवार के इस सुझाव पर संदेह व्यक्त किया कि स्थिति जानलेवा हो सकती है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हालांकि शारीरिक स्वायत्तता आमतौर पर सर्वोपरि है, लेकिन राज्य का भी वांगचुक की जान बचाने का कर्तव्य है।
मेहता ने तर्क दिया,
"आमतौर पर, इलाज कराना या न कराना किसी व्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता का मामला है। लेकिन जब स्वास्थ्य बिगड़ने से कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है, तो राज्य का हित सामने आता है।"
उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि ब्लड सैंपल की जांच न सिर्फ सफदरजंग अस्पताल में, बल्कि एम्स और एक प्राइवेट लैब में भी की गई थी, और सभी के नतीजे काफी हद तक एक जैसे थे।
इसके बाद बेंच ने कहा कि पैथोलॉजिकल रिपोर्ट की जांच मरीज़ की क्लिनिकल स्थिति के साथ की जानी चाहिए।
चीफ जस्टिस उपाध्याय ने कहा,
"पैथोलॉजिकल रिपोर्ट का मिलान मरीज़ की क्लिनिकल स्थिति से किया जाना चाहिए।"
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि सफदरजंग अस्पताल की एक रिपोर्ट में वांगचुक का पोटैशियम लेवल 2.8 दिखाया गया, जबकि अपील करने वाले की ओर से पेश की गई दूसरी रिपोर्ट में यह लेवल 3.5 था।
बेंच ने कहा,
"कोर्ट की प्राथमिकता सबसे पहले उनकी जान बचाना है, और कुछ नहीं।"
जब सिब्बल ने वांगचुक को मेदांता अस्पताल शिफ्ट करने की अपनी मांग दोहराई और सुझाव दिया कि वांगचुक की रिपोर्ट सफदरजंग अस्पताल के साथ शेयर की जाएं, तो कोर्ट ने इस पर आपत्ति जताई।
बेंच ने कहा,
"यह मेडिकल प्रोटोकॉल के बुनियादी नियमों के खिलाफ है। कोई भी अस्पताल बाहरी लोगों से मेडिकल इलाज की इजाज़त नहीं देता है।"
आखिरकार कोर्ट ने सफदरजंग अस्पताल को निर्देश दिया कि वह वांगचुक की स्थिति से जुड़ी सभी पैथोलॉजिकल रिपोर्ट और हेल्थ बुलेटिन हलफनामे के साथ जमा करे। आंग्मो को भी निर्देश दिया गया कि वह प्राइवेट लैब में किए गए टेस्ट की रिपोर्ट रिकॉर्ड पर रखे।
Title: GITANJALI J. ANGMO v. UNION OF INDIA & ORS


