'नौकरी के बदले ज़मीन' मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद यादव की याचिका पर CBI से मांगा जवाब

Shahadat

12 March 2026 10:04 AM IST

  • नौकरी के बदले ज़मीन मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने लालू प्रसाद यादव की याचिका पर CBI से मांगा जवाब

    दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार (11 मार्च) को RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव की याचिका पर CBI को नोटिस जारी किया। इस याचिका में एक स्पेशल कोर्ट के 9 जनवरी के आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें 'नौकरी के बदले ज़मीन' मामले में लालू यादव पर आरोप तय किए गए।

    CBI को नोटिस जारी करते हुए जस्टिस मनोज जैन ने दोनों पक्षों को सुनवाई का एक संभावित शेड्यूल दिया।

    कोर्ट ने कहा,

    "तदनुसार, दलीलें 17, 18 और 23, 24 मार्च को दोपहर 3:30 बजे से सुनी जाएंगी।"

    इसके साथ ही पक्षकारों से इस मामले में लिखित सारांश (Synopsis) दाखिल करने को कहा।

    यादव की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने दलील दी कि तत्कालीन मंत्री का भर्ती प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने आगे कहा कि एक निजी लेन-देन में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) लागू नहीं किया जा सकता था।

    सिब्बल ने कहा,

    "यह मामला रेलवे में क्लास D कर्मचारियों की भर्ती से जुड़ा है। आरोप है कि रेलवे ने क्लास D कर्मचारियों की भर्ती की। क्लास D कर्मचारियों की भर्ती अस्थायी आधार पर की जाती है और बाद में, यदि आवश्यक हो, तो उन्हें स्थायी कर दिया जाता है। लालू प्रसाद यादव 2004-2009 के बीच रेल मंत्री थे। इस दौरान 1500 उम्मीदवारों की भर्ती की गई। मंत्री का भर्ती प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं होता है। उनकी भर्ती कैसे की जानी है, यह एक सर्कुलर में तय होता है। जनरल मैनेजरों (GMs) को आरोपी बनाया गया है। मूल रूप से कुल 103 आरोपी थे... जिनमें से 5 की मृत्यु हो चुकी है। 103-5 में से कुल 52 लोगों को आरोप मुक्त (Discharged) किया गया। शेष 46 आरोपियों पर मुकदमा चल रहा है, जिनमें से 6 जनरल मैनेजर हैं। 14 अन्य आरोपी या तो याचिकाकर्ता के परिवार के सदस्य हैं या याचिकाकर्ता के करीबी सहयोगी हैं। 24 वे लोग हैं जो कुछ ज़मीन के लेन-देन से जुड़े हैं।"

    उन्होंने कहा कि एक निश्चित समय पर ज़मीन का एक लेन-देन हुआ था। इसमें शामिल सभी लोगों को—जैसे कि वे जनरल मैनेजर जो कथित तौर पर अनुमति देने में शामिल थे—आरोपी बनाया गया।

    उन्होंने कहा कि भर्ती किए गए 1500 लोगों में से ऐसा प्रतीत होता है कि कथित साज़िश का मकसद उनसे ज़मीन हासिल करना था।

    उन्होंने कहा,

    "खरीदी गई ज़मीन का कुल रकबा 2 एकड़ है। यह धोखा देने की एक बड़ी साज़िश है। इस मुक़दमे के दो अलग-अलग पहलू हैं... इन 6 (GMs) को आरोपी बनाया गया, क्योंकि इन्हीं के ज़रिए कर्मचारियों ने ज़मीन का सौदा किया था। परिवार के किसी एक सदस्य ने एक निश्चित कीमत पर और कुछ बदले में ज़मीन का एक टुकड़ा खरीदा। आरोप यह है कि ज़मीन की सर्कल वैल्यू, मान लीजिए, 4 लाख 10,000 रुपये है, लेकिन आपने इसे 3 लाख 70 हज़ार रुपये में खरीदा..."

    उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता पर रिश्वत लेने का आरोप भी है। अदालत ने पूछा कि क्या किसी भी शिकायतकर्ता का CrPC की धारा 161 के तहत कोई बयान दर्ज है, जिस पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि ऐसा कोई बयान नहीं है।

    सिब्बल ने कहा,

    "6 GMs को सरकारी गवाह (Approver) बनाया गया और उन्हें माफ़ी दे दी गई... उन्होंने मुक़दमा कैसे शुरू किया? क्योंकि CBI को कुछ जानकारी मिली थी। उन्हें (CBI को) यह जानकारी कैसे मिली? किसी ने कोई शिकायत नहीं की थी।"

    "क्विड प्रो क्वो" (बदले में कुछ देना-लेना) के मुद्दे पर याचिकाकर्ता की कथित भूमिका के संबंध में सिब्बल ने कहा कि किसी कर्मचारी को यह कहना होगा कि उसे नौकरी दी गई, जिसके बदले में उसने अपनी ज़मीन दे दी। उन्होंने कहा कि किसी भी कर्मचारी का ऐसा कोई बयान नहीं है। उन्होंने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) लगाए जाने पर भी सवाल उठाया।

    इस बीच, एक अन्य वकील ने कहा,

    "कल सरकारी गवाह को बुलाया जाना था। अगर सभी सरकारी गवाह स्पेशल जज के सामने पेश हो जाते हैं तो यह मामला खत्म हो जाएगा... माई लॉर्ड्स, आप सरकारी गवाहों की पेशी कुछ समय के लिए टाल सकते हैं..."

    इस मोड़ पर अदालत ने मौखिक रूप से पूछा कि वकीलों को अपनी दलीलें पूरी करने में अंदाज़न कितना समय लगेगा।

    अदालत ने मामले में गवाहों की संख्या के बारे में भी पूछा, जिस पर CBI के वकील ने बताया कि 100 से ज़्यादा गवाह हैं और उनमें से अब तक सिर्फ़ एक की ही गवाही हुई।

    इस मोड़ पर अदालत ने मौखिक रूप से कहा,

    "...आप 10 दिनों तक अपने सरकारी गवाहों को पेश न करें... हम सुनवाई नहीं रोकेंगे।"

    इस पर CBI के वकील ने कहा कि सरकारी गवाहों के अलावा, वे अन्य गवाहों को पेश करेंगे।

    बता दें, राउज़ एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जज विशाल गोगने की अदालत ने कहा कि यादव और उनके परिवार ने एक आपराधिक गिरोह (Criminal Syndicate) की तरह काम किया और उनकी तरफ़ से एक बड़ी साज़िश रची गई।

    जज ने आदेश सुनाते हुए कहा,

    “अदालत को संदेह के आधार पर यह लगता है कि लालू प्रसाद यादव ने एक बड़ी साज़िश रची थी, जिसके तहत उन्होंने सरकारी नौकरियों को अपने परिवार (बेटियों, पत्नी और बेटों) के लिए अचल संपत्तियाँ हासिल करने के लिए सौदेबाजी के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया।”

    अदालत ने यह भी कहा कि CBI की चार्जशीट से पता चलता है कि यादव के करीबी सहयोगियों ने साज़िश में शामिल होकर उनकी मदद की। अदालत ने यादव और उनके परिवार द्वारा दायर डिस्चार्ज की अर्जी को पूरी तरह से बेबुनियाद बताते हुए खारिज किया।

    98 आरोपियों में से कोर्ट ने 52 लोगों को बरी किया, जिनमें कुछ CPO भी शामिल थे। 41 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए। कोर्ट ने यादव की पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी प्रसाद यादव और कई अन्य आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप भी तय किए।

    इस मामले में कुल 107 लोगों को आरोपी बनाया गया। हालांकि, उनमें से पांच लोगों की मौत हो चुकी है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई खत्म कर दी गई।

    CBI ने 10 अक्टूबर, 2022 को इस मामले में 16 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटी मीसा भारती और अन्य लोग इस मामले में आरोपी हैं।

    एजेंसी का कहना है कि 2004 से 2009 के बीच बिहार के कई लोगों को मुंबई, जबलपुर, कोलकाता, जयपुर और हाजीपुर में स्थित रेलवे के अलग-अलग ज़ोन में "ग्रुप-D पदों" पर सब्स्टीट्यूट के तौर पर नियुक्त किया गया।

    आरोप है कि इसके बदले में उन लोगों ने खुद या उनके परिवारों ने अपनी ज़मीन तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के परिवार के सदस्यों और M/s AK Infosystems Private Limited नाम की एक कंपनी के नाम पर ट्रांसफर कर दी, जिसे बाद में उनके परिवार के सदस्यों ने अपने कब्ज़े में ले लिया।

    CBI ने दावा किया कि रेलवे में की गई ये नियुक्तियां, भर्ती के लिए भारतीय रेलवे द्वारा तय किए गए मानकों और दिशा-निर्देशों के मुताबिक नहीं थीं।

    Case title: Lalu Prasad Yadav v/s CBI

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