BNSS की धारा 223 पर बड़ा सवाल: 'संज्ञान' के चरण को लेकर दिल्ली हाइकोर्ट ने मामला बड़ी पीठ को भेजा
Amir Ahmad
25 March 2026 1:41 PM IST

दिल्ली हाइकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 के तहत संज्ञान लेने के चरण को लेकर उत्पन्न कानूनी अस्पष्टता पर महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए मामले को बड़ी पीठ को सौंप दिया।
जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा ने पाया कि इस प्रावधान की व्याख्या को लेकर विभिन्न हाईकोर्टों के फैसलों और सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों में संभावित टकराव नजर आ रहा है।
BNSS की धारा 223 के तहत मजिस्ट्रेट को शिकायत मिलने पर संज्ञान लेते समय शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान शपथ पर दर्ज करने होते हैं। साथ ही इसके प्रावधान में यह भी कहा गया कि संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर दिया जाए।
मुद्दा यह है कि आखिर संज्ञान लेने का सही चरण क्या है? क्या यह बयान दर्ज करने से पहले होता है या बाद में?
अदालत ने बड़ी पीठ के समक्ष दो प्रमुख सवाल रखे हैं:
पहला, व्यक्तिगत शिकायत के मामलों में मजिस्ट्रेट कब यह माना जाएगा कि उसने अपराध का संज्ञान लिया और क्या शिकायतकर्ता व गवाहों के बयान दर्ज करना संज्ञान से पहले की प्रक्रिया है।
दूसरा, आरोपी को नोटिस किस चरण में दिया जाना चाहिए कि क्या शिकायत पढ़ने के बाद और बयान दर्ज करने से पहले या फिर बयान दर्ज होने के बाद लेकिन संज्ञान लेने से पहले।
हाईकोर्ट ने कहा कि कुछ हाईकोर्टों ने यह माना कि शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज करना संज्ञान से पहले की प्रक्रिया है और संज्ञान बाद में लिया जाता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में यह स्थापित किया गया कि संज्ञान उस समय माना जाता है, जब मजिस्ट्रेट किसी अपराध पर आगे बढ़ने के लिए अपना न्यायिक मन लागू करता है, और उसके बाद ही अन्य प्रक्रियाएं शुरू होती हैं।
अदालत ने सारा मैथ्यू बनाम इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियो वैस्कुलर डिजीज मामले का हवाला देते हुए कहा कि संज्ञान लेने का चरण प्रारंभिक होता है, न कि बाद का।
इन विरोधाभासी व्याख्याओं को देखते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की एकरूपता के लिए इस मुद्दे पर बड़ी पीठ का निर्णय जरूरी है। अब बड़ी पीठ यह तय करेगी कि BNSS के तहत संज्ञान लेने की सही प्रक्रिया और आरोपी को नोटिस देने का उचित समय क्या है?

