दिल्ली हाईकोर्ट ने वकीलों को निशाना बनाने वाली, राजनीतिक और सांप्रदायिक पोस्ट के सर्कुलेशन पर लगाई रोक

Shahadat

17 April 2026 10:43 AM IST

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने वकीलों को निशाना बनाने वाली, राजनीतिक और सांप्रदायिक पोस्ट के सर्कुलेशन पर लगाई रोक

    दिल्ली हाईकोर्ट ने 'जॉन डो' (अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ) आदेश पारित करते हुए दो वकीलों के खिलाफ कथित तौर पर मानहानिकारक और सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्ट के सर्कुलेशन पर रोक लगाई। कोर्ट ने कहा कि ऐसी सामग्री उनकी गरिमा और निजी जीवन पर असर डालती है।

    जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद वकीलों द्वारा दायर मुकदमे की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें उन्होंने स्थायी और अनिवार्य निषेधाज्ञा, हर्जाना और X Corp. (पहले Twitter) को आपत्तिजनक सामग्री हटाने का निर्देश देने की मांग की थी।

    वादी विवाहित जोड़ा और कानूनी पेशेवर हैं। उसने आरोप लगाया कि अज्ञात सोशल मीडिया अकाउंट्स और अज्ञात व्यक्तियों द्वारा सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें उन्हें निशाना बनाते हुए झूठी, दुर्भावनापूर्ण और सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ सामग्री प्रकाशित की जा रही है।

    इस मुकदमे में दो अज्ञात X अकाउंट्स के साथ-साथ 'जॉन डो' (अज्ञात संस्थाओं) को भी प्रतिवादी बनाया गया।

    वकीलों के पक्ष में अंतरिम निषेधाज्ञा जारी करते हुए कोर्ट ने कहा कि ये ट्वीट सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ, अश्लील और अभद्र प्रकृति के थे, जो उनकी गरिमा और निजी जीवन पर असर डालते हैं।

    कोर्ट ने कहा,

    "ट्वीट की सामग्री अत्यंत अपमानजनक है। कोई भी स्वाभिमानी और गरिमापूर्ण इंसान शांति से और सिर उठाकर तब तक नहीं जी सकता, जब तक उसके खिलाफ ऐसी निंदनीय और अभद्र पोस्ट आम जनता के बीच फैलाई जाती रहेंगी।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि ट्वीट में शामिल सामग्री का एक बड़ा हिस्सा ऐसे बयानों से बना था, जिन्हें सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ माना जा सकता है।

    कोर्ट ने कहा कि वकीलों की राजनीतिक विचारधारा के संदर्भ में उनके निजी जीवन का भी ज़िक्र किया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि "विपरीत राजनीतिक विचारधारा रखने वाले लोगों द्वारा एक सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा है।"

    कुछ पोस्ट में शारीरिक और यौन हिंसा की धमकियां होने की बात पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा:

    "इन सभी पोस्ट ने आम जनता का व्यापक ध्यान आकर्षित किया। इसका एक कारण आपत्तिजनक सामग्री में इस्तेमाल की गई भाषा भी है, जो इस कोर्ट की प्रथम दृष्टया राय में इस तरह से लिखी गई है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का ध्यान खींचा जा सके।"

    कोर्ट ने फैसला सुनाया कि आपत्तिजनक सामग्री का लगातार सर्कुलेशन वादियों की प्रतिष्ठा और करियर को नुकसान पहुंचा सकता है। यदि इसे तुरंत नहीं हटाया गया तो प्रतिष्ठा को होने वाले इस नुकसान की भरपाई आर्थिक रूप से नहीं की जा सकेगी।

    कोर्ट ने निर्देश दिया,

    "अतः, प्रतिवादियों, उनके एजेंटों, सहयोगियों या उनकी ओर से कार्य करने वाले किसी भी व्यक्ति को वादियों के संबंध में किसी भी प्रकार की मानहानिकारक, झूठी, भ्रामक, सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ या अपमानजनक सामग्री को प्रकाशित करने, दोबारा पोस्ट करने, प्रसारित करने या किसी भी अन्य तरीके से फैलाने से रोका जाता है।"

    इसमें आगे कहा गया,

    “इसके अलावा, प्रतिवादी नंबर 2 से 4 को निर्देश दिया जाता है कि वे X (Twitter) प्लेटफ़ॉर्म और किसी भी अन्य प्लेटफ़ॉर्म से, जहां भी वादी से संबंधित आपत्तिजनक पोस्ट, ट्वीट और संबंधित सामग्री पहले प्रकाशित या साझा की गई हो, उसे इस आदेश के अपलोड होने की तारीख से तीन (3) दिनों के भीतर हटा दें/डिलीट कर दें/नीचे उतार लें।”

    जस्टिस प्रसाद ने X Corp को भी निर्देश दिया कि वह आपत्तिजनक सामग्री और वकीलों से संबंधित किसी भी समान या मिलती-जुलती सामग्री को हटा दे, उस तक पहुँच को अक्षम कर दे और उसके आगे प्रसार को रोक दे।

    इस बात को दोहराते हुए कि प्रतिष्ठा, भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग है, न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

    Title: X & Anr v. X CORP AND ORS

    Next Story