ग्रामीण विकास बैंक धोखाधड़ी मामला: दिल्ली हाई कोर्ट ने अयोग्य घोषित Congress MLA की सज़ा पर रोक लगाने किया इनकार
Shahadat
10 July 2026 7:49 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश के अयोग्य घोषित कांग्रेस विधायक (Congress MLA) राजेंद्र भारती की याचिका खारिज की। उन्होंने 1998 और 2011 के बीच बैंक रिकॉर्ड में हेराफेरी करके अवैध रूप से ब्याज भुगतान हासिल करने के धोखाधड़ी मामले में अपनी दोषसिद्धि पर रोक लगाने की मांग की थी। [2026 LiveLaw (Del) 643]
जस्टिस मनोज जैन ने याचिका खारिज की।
कोर्ट ने 28 अप्रैल को भारती को सुनाई गई तीन साल की सजा पर रोक लगाई थी।
भारती के वकील ने कहा था कि एक बार उनकी दोषसिद्धि पर रोक लग जाने के बाद उनकी अयोग्यता का कोई आधार नहीं रहेगा। इस तरह उनकी विधानसभा सीट खाली घोषित नहीं की जाएगी।
दोषी ठहराए जाने के बाद भारती को राज्य विधानसभा से अयोग्य घोषित कर दिया गया था। विधानसभा ने दतिया विधानसभा सीट से उनकी सदस्यता रद्द करने का नोटिफिकेशन जारी किया।
अपनी याचिका में भारती ने मामले में उन्हें दोषी ठहराने वाले ट्रायल कोर्ट के 1 अप्रैल के आदेश और उन्हें तीन साल की जेल की सजा सुनाने वाले 2 अप्रैल के आदेश को चुनौती दी।
जिला सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक, दतिया द्वारा 2015 में दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, बैंक के तत्कालीन चेयरमैन भारती ने बैंक अधिकारियों पर दबाव डालकर 10 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की अवधि 3 साल से बढ़ाकर 15 साल करवा दी थी।
इसके अलावा, यह आरोप लगाया गया कि ऐसा 'श्री श्याम सुंदर श्याम पब्लिक यूनिटी एंड कम्युनिटी डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन ट्रस्ट' को फायदा पहुंचाने के इरादे से किया गया ताकि संगठन को अतिरिक्त 12 वर्षों के लिए 13.5% प्रति वर्ष की दर से ब्याज का लाभ मिल सके।
7 अक्टूबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एमपी कोर्ट में लंबित मामले को तीस हजारी कोर्ट के पीठासीन जज के पास ट्रांसफर कर दिया। बाद में मामले को राउज एवेन्यू कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया।
ट्रायल कोर्ट ने भारती और पूर्व कैशियर रघुवीर शरण प्रजापति पर 1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। दोनों को आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, मूल्यवान प्रतिभूति (valuable security) में हेराफेरी, धोखाधड़ी के लिए हेराफेरी और जाली दस्तावेज को असली बताकर इस्तेमाल करने के अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया। विवादित आदेश के ज़रिए, स्पेशल जज ने आरोपियों की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया कि सरकारी कर्मचारी होने के नाते, सरकारी मंज़ूरी के बिना उनके सरकारी कामकाज को लेकर उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी और जालसाज़ी "कर्तव्य का पालन करने के बजाय कर्तव्य में लापरवाही" है।
जज ने पाया कि भारती और प्रजापति, और शायद कुछ अज्ञात लोगों ने शिकायतकर्ता बैंक के साथ धोखाधड़ी करने की साज़िश रची थी। उन्होंने 2011 के बाद भी बहुत ज़्यादा दर पर ब्याज लेना जारी रखा, जबकि उनकी फिक्स्ड डिपॉज़िट की शुरुआती अवधि तीन साल की ही थी।
ट्रायल कोर्ट ने भारती की इस दलील को खारिज कर दिया था कि उन्हें राजनीतिक कारणों से निशाना बनाया गया था या उन पर मुकदमा राजनीतिक मंशा से चलाया गया था।
इसके बजाय, जज ने कहा कि यह मामला 1998 और 2011 के बीच बैंक के दस्तावेज़ों में जालसाज़ी और बैंक के साथ धोखाधड़ी का था - यानी उस कथित राजनीतिक दुश्मनी से बहुत पहले की बात, जिसका ज़िक्र भारती ने किया था।
Title: Rajendra Bharti v. State


