“प्रशासनिक सुस्ती कभी भी पर्याप्त कारण नहीं हो सकती”: हाईकोर्ट ने DDA की 1600 दिनों की देरी को माफ़ करने से इनकार किया

Shahadat

9 May 2026 9:55 AM IST

  • “प्रशासनिक सुस्ती कभी भी पर्याप्त कारण नहीं हो सकती”: हाईकोर्ट ने DDA की 1600 दिनों की देरी को माफ़ करने से इनकार किया

    दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) द्वारा ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील दायर करने में हुई 1600 दिनों की देरी को माफ़ करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि “प्रशासनिक सुस्ती और लापरवाही” देरी को माफ़ करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं हो सकती।

    जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने DDA की अर्जी खारिज की, जिसमें फ्लैट के आवंटन से जुड़े विवाद में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज द्वारा 8 जून, 2018 को दिए गए फैसले के खिलाफ 'रेगुलर फर्स्ट अपील' दायर करने में हुई देरी को माफ़ करने की मांग की गई थी।

    DDA ने दलील दी थी कि यह देरी फाइल के अलग-अलग विभागों से होकर गुजरने और प्राधिकरण के भीतर इस बात पर फैसला न हो पाने के कारण हुई कि फैसले को चुनौती दी जाए या उसका पालन किया जाए।

    प्राधिकरण ने आंतरिक बैठकों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और वकील द्वारा फाइल लौटाने में हुई देरी का भी हवाला दिया।

    DDA के अनुसार, फाइल लंबे समय तक बिना किसी के ध्यान के पड़ी रही और आखिरकार एक ऐसे कर्मचारी की मेज पर मिली, जो जुलाई 2019 में रिटायर हो चुका था। प्राधिकरण ने आगे तर्क दिया कि वह वैधानिक सार्वजनिक संस्था है और उसे व्यक्तिगत अधिकारियों की “छोटी-मोटी गलतियों” के कारण नुकसान नहीं उठाना चाहिए।

    इस स्पष्टीकरण को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि DDA द्वारा प्रस्तुत घटनाक्रम से लंबे समय तक चली “उदासीनता” और “पूरी तरह से लापरवाही” झलकती है।

    “शब्द 'पर्याप्त कारण' (Sufficient Cause) लापरवाही भरे और पुराने दावों को थोपने की बीमारी का कोई आसान इलाज नहीं है। इस अभिव्यक्ति की व्याख्या न्याय-उन्मुख लचीलेपन के साथ की जानी चाहिए, ताकि निर्दोष वादियों को दंडित न किया जाए…”

    कोर्ट ने आगे टिप्पणी की कि DDA खुद भी इस बात को लेकर अनिश्चित लग रहा था कि क्या अपील करना भी उचित है। ट्रायल कोर्ट के आदेश का पालन करने के संबंध में वह “भ्रम की स्थिति” में बना रहा।

    फैसले में यह दर्ज है कि अपील आखिरकार तभी दायर की गई, जब आदेश के निष्पादन की कार्यवाही शुरू हुई और DDA के उपाध्यक्ष (Vice Chairman) के खिलाफ वारंट जारी किए गए।

    इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने 'शिवम्मा (मृत) बनाम कर्नाटक हाउसिंग बोर्ड और अन्य, 2025' मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “प्रशासनिक सुस्ती और लापरवाही कभी भी देरी को माफ़ करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकती।”

    इस प्रकार, अपील को समय-सीमा से बाहर (Time-Barred) होने के कारण को खारिज किया।

    Case title: DDA v. Manmohan Singh Bedi

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