संदेह का लाभ देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने 2006 के अपहरण और दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी किया
Praveen Mishra
23 July 2026 5:13 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2006 के एक कथित अपहरण और दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
अदालत ने कहा कि गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास, फोरेंसिक साक्ष्यों की कमजोरी और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) दिया जाना चाहिए।
जस्टिस विमल कुमार यादव ने राम चंदर की अपील स्वीकार करते हुए वर्ष 2008 में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363 (अपहरण) और 376 (दुष्कर्म) के तहत हुई उसकी दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया।
ट्रायल कोर्ट ने उसे दुष्कर्म के लिए सात वर्ष के कठोर कारावास और अपहरण के लिए एक वर्ष के साधारण कारावास की सजा सुनाई थी।
अभियोजन के अनुसार, वर्ष 2006 में 13 वर्षीय लड़की लापता हो गई थी और बाद में आरोपी के साथ बरामद हुई। वहीं, आरोपी का कहना था कि युवती अपनी इच्छा से उसके साथ गई थी और घटना के समय वह बालिग थी।
अपील लंबित रहने के दौरान युवती ने भी अदालत में उपस्थित होकर कहा कि वह अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी और उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं चाहती।
अपहरण के आरोप पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जिरह के दौरान पीड़िता ने स्वीकार किया था कि वह आरोपी के साथ सार्वजनिक परिवहन से यात्रा करती रही, नवरात्रि के दौरान भीड़भाड़ वाले कालकाजी मंदिर भी गई, लेकिन उसने किसी से मदद नहीं मांगी और न ही कोई शोर मचाया।
अदालत ने कहा कि ये परिस्थितियां अभियोजन के उस आरोप को कमजोर करती हैं कि उसे जबरन ले जाया गया था।
पीड़िता की उम्र के संबंध में अदालत ने ऑसिफिकेशन टेस्ट पर भरोसा करते हुए कहा कि इसमें दो वर्ष तक की त्रुटि की संभावना रहती है।
इस आधार पर उसकी उम्र 18.4 वर्ष तक मानी जा सकती है, जिससे यह मामला वैध अभिभावक की अभिरक्षा से अपहरण (Kidnapping from Lawful Guardianship) की श्रेणी से बाहर हो जाता है।
दुष्कर्म के आरोप पर अदालत ने माना कि मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्य यौन संबंध होने की ओर संकेत करते हैं, लेकिन फोरेंसिक साक्ष्य निर्णायक नहीं थे।
अदालत ने कहा कि पीड़िता का घटना से पहले, दौरान और बाद का आचरण अभियोजन की कहानी से मेल नहीं खाता और बाद में उसका यह कहना कि वह स्वेच्छा से आरोपी के साथ गई थी, अभियोजन के मामले को और कमजोर करता है।
अदालत ने कहा कि वैज्ञानिक और फोरेंसिक साक्ष्यों के ठोस समर्थन के अभाव में केवल ऐसे साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि बनाए रखना सुरक्षित नहीं होगा। इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए उसकी अपील स्वीकार की जाती है।
निर्णय की शुरुआत में न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव ने यह भी टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति का नाम उसके चरित्र का निर्धारण नहीं करता।
उन्होंने विलियम शेक्सपीयर, संत कबीर और भगवद्गीता के कर्मयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्ति का मूल्यांकन उसके कर्मों से होना चाहिए, केवल उसके नाम से नहीं।


