ज्यूडिशियल अलाउंस को नॉन-टैक्सेबल इनकम बताने का मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने जजों को ITR फाइल करने का अंतरिम आदेश दिया
Shahadat
23 July 2026 9:51 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश पास किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को अपने इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते समय 'हाईकोर्ट जजेज़ (सैलरी एंड कंडीशंस ऑफ़ सर्विस) एक्ट, 1954' की धारा 22D और 'सुप्रीम कोर्ट जजेज़ (सैलरी एंड कंडीशंस ऑफ़ सर्विस) एक्ट, 1958' की धारा 23D के तहत तय ज्यूडिशियल अलाउंस को "इनकम की प्रकृति वाली प्राप्तियां नहीं" के तौर पर दिखाने की इजाज़त दी गई।
बता दें, 1954 के एक्ट की धारा 22A, 22B और 22C के तहत मिलने वाले अलाउंस और हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के जजों को मिलने वाली 'लीव ट्रैवल कंसेशन' (LTC) को 'इनकम टैक्स एक्ट, 1961' की धारा 15 के तहत सैलरी हेड में आने वाली उनकी इनकम की गणना से पूरी तरह बाहर रखा गया।
हालांकि, 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्ट टैक्सेस' ने 12 सितंबर, 2025 को एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया, जिसमें 'इनकम टैक्स एक्ट, 1961' की धारा 115BAC(1A) के तहत नई व्यवस्था (रिजीम) चुनने पर ऐसी छूट देने से इनकार किया गया।
जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की डिवीजन बेंच ने शुरुआती तौर पर माना कि 'इनकम टैक्स एक्ट' की धारा 115BAC, ऐसे अलाउंस से जुड़ी धाराओं 22D और 23D में दी गई कानूनी सुरक्षा को खत्म नहीं करती है।
कोर्ट 'दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन' की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जो जजों को टैक्स से जुड़े मामलों पर नियमित रूप से सलाह देती है और ज्यूडिशियल इंडिपेंडेंस (न्यायिक स्वतंत्रता) बनाए रखने को लेकर चिंतित थी।
शुरुआत में, बेंच ने अपने खुद के टैक्स फाइलिंग के बारे में जानकारी दी। जहां जस्टिस गुप्ता ने बताया कि उन्होंने विवादित अलाउंस पर छूट का दावा किए बिना नई टैक्स व्यवस्था के तहत अपना रिटर्न पहले ही फाइल कर दिया, वहीं जस्टिस मेहता ने कहा कि वे पुरानी व्यवस्था के तहत अपना रिटर्न फाइल करना चाहते हैं ताकि यह विवाद फैसले पर असर न डाले।
बार एसोसिएशन की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सचित जॉली ने तर्क दिया कि धारा 22D और 23D स्पष्ट रूप से कुछ अलाउंस—जैसे बिना किराए का सरकारी घर, आने-जाने की सुविधा, समप्टुअरी अलाउंस और लीव ट्रैवल कंसेशन—को सैलरी इनकम की गणना से बाहर रखती हैं। यह तर्क दिया गया कि CBDT का मेमोरेंडम असल में जजों को मिले पक्के अधिकारों को छीनता है और संविधान के आर्टिकल 125 और 221 का उल्लंघन करता है। ये आर्टिकल सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के बाद उनके वेतन और भत्तों में किसी भी तरह के नुकसानदेह बदलाव पर रोक लगाते हैं।
जॉली ने तर्क दिया कि धारा 22D और 23D सिर्फ़ कटौती या छूट नहीं देते, बल्कि तय भत्तों को टैक्स लगने वाले वेतन के दायरे से पूरी तरह बाहर रखते हैं। उन्होंने कहा कि इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 115BAC और इनकम टैक्स एक्ट, 2025 की धारा 202 के तहत लाई गई नई टैक्स व्यवस्था इन प्रावधानों को ओवरराइड नहीं कर सकती।
भारत सरकार की ओर से पेश वकील ने जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ़्ते का समय मांगा।
अपनी शुरुआती राय दर्ज करते हुए बेंच ने कहा:
“धारा 22D और 23D में मौजूद 'नॉन-ऑब्सटैंट क्लॉज़' (जो दूसरे कानूनों पर प्राथमिकता देता है) धारा 22D/23D को इनकम-टैक्स एक्ट, 1961 के सभी प्रावधानों (जिसमें धारा 115BAC भी शामिल है) पर प्राथमिकता देता है। इसके अलावा, धारा 22D में इस्तेमाल की गई भाषा भत्तों को 'वेतन' हेड के तहत इनकम की गणना से भी बाहर रखती है—'जो रकम इनकम में शामिल ही नहीं है, उसे छूट या कटौती वाली रकम नहीं कहा जा सकता' ताकि वह 1961 के एक्ट की धारा 115BAC के नियमों के खिलाफ़ हो।”
कोर्ट ने माना कि इस मामले पर विचार करने की ज़रूरत है और इस बीच निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज अपने इनकम टैक्स रिटर्न या रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। इसमें वे धारा 22D और 23D के तहत आने वाले भत्तों को ई-फाइलिंग पोर्टल के “Exempt Income” (छूट वाली इनकम) सेक्शन में “receipts not in the nature of income” (इनकम की प्रकृति वाली प्राप्तियां नहीं) के तौर पर दिखा सकते हैं।
कोर्ट ने साफ़ किया कि अगले आदेश तक ऐसे रिटर्न प्रोसेस नहीं किए जाएंगे।
अब यह मामला 3 सितंबर को सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया।
गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप जैन ने नई इनकम टैक्स व्यवस्था के तहत हाईकोर्ट जजेज़ (सैलरी एंड कंडीशंस ऑफ़ सर्विस) एक्ट, 1954 के सेक्शन 22D में बताए गए कानूनी भत्तों पर टैक्स छूट न मिलने को चुनौती दी। जज ने छूट न दिए जाने के फ़ैसले को चुनौती दी। उनका तर्क है कि CBDT का 12.09.2025 का ऑफिस मेमोरैंडम मनमाना, अन्यायपूर्ण और गैर-कानूनी है। यह मेमोरैंडम इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 115BAC(1A) के तहत नई व्यवस्था चुनने पर, 1954 के एक्ट की धारा 22D के तहत मिलने वाले अनुलाभों/छूटों का कानूनी फ़ायदा देने से मना करता है।
Case Title: Delhi Tax Bar Association Through Its Secretary K G Bansal v. Union of India & Anr.


