जम्मू-कश्मीर आतंकी साजिश मामले में आरोपी को मिली जमानत बरकरार, NIA की अपील दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की
Amir Ahmad
31 Oct 2026 1:45 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में आतंकी साजिश से जुड़े मामले में आरोपी मतीन अहमद भट को दी गई जमानत के खिलाफ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की अपील खारिज की।
मामले में लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे प्रतिबंधित आतंकी संगठनों से जुड़े लोगों की कथित साजिश का आरोप है।
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस अरुण भारद्वाज की खंडपीठ ने कहा कि विशेष अदालत ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के प्रावधानों के तहत जमानत देते समय रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर उचित विचार किया। इसलिए उसके आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत देने के आदेश के खिलाफ अपील और पहले से मिली जमानत रद्द करने की मांग, दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं।
पीठ ने कहा,
"जमानत देने के आदेश को निरस्त करना और जमानत रद्द करना दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं।"
अदालत ने दोहराया कि उच्च अदालत किसी जमानत आदेश में तभी हस्तक्षेप कर सकती है, जब उसमें अवैधता, मनमानी, विकृति या प्रासंगिक तथ्यों पर विचार न करने जैसी गंभीर खामी हो।
NIA ने स्पेशल NIA कोर्ट, पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा 3 मई 2023 को पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत मतीन अहमद भट को जमानत दी गई थी। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120बी, 121ए, 122 और 123 तथा UAPA की धारा 18, 18ए, 18बी, 20, 38 और 39 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद आरोपी कथित तौर पर कट्टरपंथ की ओर प्रभावित हुआ और 'सबजार' नाम से सक्रिय हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी के संपर्क में आया।
NIA का आरोप था कि आरोपी प्रतिबंधित आतंकी संगठन के लिए ओवर ग्राउंड वर्कर के रूप में काम कर रहा था। वह सक्रिय आतंकियों को रसद और अन्य सहायता उपलब्ध कराता था, हथियारों और गोला-बारूद की आवाजाही में मदद करता था तथा स्थानीय युवाओं को आतंकी संगठनों में भर्ती करने का प्रयास करता था।
जांच एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के संचालकों द्वारा चलाए जा रहे ऑनलाइन प्रचार समूहों से जुड़ा हुआ था।
जमानत के आदेश को चुनौती देते हुए NIA ने दलील दी कि विशेष अदालत ने सबूतों का अलग-अलग मूल्यांकन करके जमानत के स्तर पर ही मामले का मिनी ट्रायल किया था। एजेंसी के अनुसार, आरोपी के मोबाइल फोन की फॉरेंसिक जांच में कॉल रिकॉर्ड और आपत्तिजनक वॉइस नोट मिले थे।
NIA ने अभियोजन पक्ष के एक गवाह के बयान का भी हवाला दिया। गवाह के अनुसार, आरोपी ने अपना मोबाइल फोन एक अन्य आरोपी को दिया था, ताकि वह पाकिस्तान में सीमा पार मौजूद लोगों से संपर्क कर सके।
जांच एजेंसी ने यह भी बताया कि विशेष अदालत बाद में आरोपी के खिलाफ आरोप तय कर चुकी है।
दूसरी ओर, आरोपी की ओर से पेश वकील ने जमानत आदेश का बचाव करते हुए कहा कि स्पेशल कोर्ट ने जमानत देते समय कोई गलती नहीं की थी। यह भी बताया गया कि आरोप तय करने के आदेश को अलग से हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि स्पेशल कोर्ट ने UAPA की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर लागू प्रतिबंधों पर विचार किया था।
अदालत ने यह भी जांचा था कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर आरोपी के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं या नहीं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि स्पेशल कोर्ट का जमानत आदेश साक्ष्यों पर अंतिम निष्कर्ष नहीं था और न ही उसका उद्देश्य आरोपी को आरोपों से मुक्त करना था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी के खिलाफ बाद में आरोप तय किया जाना, NIA की जमानत आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर फैसला करने के लिए प्रासंगिक नहीं है।
हालांकि, पीठ ने आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की गंभीरता को स्वीकार किया और कहा कि इन आरोपों की सत्यता का परीक्षण मुकदमे के दौरान किया जाएगा।
अदालत ने यह भी गौर किया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों की बड़ी संख्या और अभी कई गवाहों की गवाही बाकी होने के कारण मुकदमे के जल्द पूरा होने की संभावना नहीं है।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने NIA की अपील में कोई दम नहीं पाया और उसे खारिज किया।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट और स्पेशल कोर्ट द्वारा जमानत के समय की गई टिप्पणियां मुकदमे के गुण-दोष पर फैसला करते समय ट्रायल कोर्ट को प्रभावित नहीं करेंगी।

