क्वीयर पार्टनर को मेडिकल फैसलों के लिए नामित करने की अनुमति संभव: केंद्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा

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    केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा है कि किसी सक्षम वयस्क व्यक्ति को अपने पार्टनर, जिसमें क्वीयर या गैर-विषमलैंगिक पार्टनर भी शामिल है, को भविष्य में असमर्थ होने की स्थिति में स्वास्थ्य संबंधी फैसले लेने के लिए नामित करने की अनुमति दी जा सकती है।

    केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने कहा कि यह व्यवस्था मौजूदा कानूनी और नैतिक ढांचे में उचित सुरक्षा उपायों और लागू कानून के अधीन अपनाई जा सकती है।

    यह दलील अर्शिया टक्कर की याचिका पर एनएमसी द्वारा दाखिल हलफनामे में दी गई। याचिका में क्वीयर पार्टनर को मरीज का मेडिकल प्रतिनिधि मानने और उसे मेडिकल परिस्थितियों में सहमति देने का अधिकार देने के लिए दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है।

    केंद्र ने कहा कि यदि किसी सक्षम वयस्क ने पहले से अपने पार्टनर को अपनी ओर से मेडिकल फैसले लेने के लिए अधिकृत किया है, तो केवल सेक्स, जेंडर या यौन अभिविन्यास के आधार पर उसे बाहर करने का कोई चिकित्सीय या नैतिक आधार नहीं है।

    केंद्र ने इंडियन मेडिकल काउंसिल के 2002 के नियमों के क्लॉज 7.16 का हवाला देते हुए कहा कि इसकी ऐसी व्याख्या की जा सकती है जिससे मरीज द्वारा नामित पार्टनर को केवल इसलिए बाहर न किया जाए क्योंकि उनका रिश्ता औपचारिक विवाह के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है।

    केंद्र के अनुसार, ऐसा दृष्टिकोण मरीज की स्वायत्तता, गरिमा, समानता और गैर-भेदभाव जैसे संवैधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाएगा।

    पिछले महीने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने भी सवाल उठाया था कि यदि समान-लैंगिक पार्टनर्स को रिश्ते में रहने और साथ रहने का अधिकार है, तो उन्हें एक-दूसरे के लिए मेडिकल सहमति देने के विकल्प से क्यों वंचित किया जाना चाहिए।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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