मध्यस्थता में बीता समय लिखित जवाब दाखिल करने की समय-सीमा से बाहर माना जाए या नहीं? दिल्ली हाईकोर्ट की बड़ी पीठ करेगी फैसला
Amir Ahmad
3 July 2026 1:47 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न बड़ी पीठ के पास भेज दिया कि क्या मध्यस्थता में बीता समय लिखित जवाब या प्रत्युत्तर दाखिल करने की निर्धारित समय-सीमा की गणना से बाहर रखा जाना चाहिए?
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि इस मुद्दे पर हाईकोर्ट के अलग-अलग फैसलों में विरोधाभास है। ऐसे में संयुक्त रजिस्ट्रारों द्वारा देरी माफ करने से जुड़ी अर्जियों पर एकरूपता से निर्णय हो सके इसके लिए बड़ी पीठ का स्पष्ट और प्रामाणिक फैसला आवश्यक है।
मामला एक वाणिज्यिक वाद से जुड़ा है, जिसमें संयुक्त रजिस्ट्रार ने निर्धारित अधिकतम समय-सीमा के बाद लिखित जवाब दाखिल करने के आधार पर प्रतिवादियों का अधिकार समाप्त कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ प्रतिवादियों ने चैंबर अपील दायर की।
प्रतिवादियों का तर्क था कि जिस अवधि के दौरान दोनों पक्ष मध्यस्थता की प्रक्रिया में शामिल रहे और बाद में वह असफल रही उस समय को लिखित जवाब दाखिल करने की समय-सीमा की गणना से बाहर रखा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रश्न पर पहले दिए गए फैसलों में अलग-अलग राय सामने आई है। कुछ फैसलों में कहा गया कि लिखित जवाब दाखिल करने की 120 दिन की अनिवार्य अधिकतम अवधि में से मध्यस्थता का समय बाहर नहीं किया जा सकता।
वहीं बाद के कुछ अन्य फैसलों में यह माना गया कि मध्यस्थता की अवधि को अलग रखने से दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 89 का उद्देश्य पूरा होता है, क्योंकि इससे पक्षकार अदालत के बाहर विवाद सुलझाने के लिए गंभीरता से प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 89 अदालतों को मध्यस्थता के माध्यम से विवाद निपटाने के लिए पक्षकारों को प्रोत्साहित करने का दायित्व देती है।
यदि मध्यस्थता चल रही हो और उसी दौरान पक्षकारों को लिखित जवाब दाखिल करने के लिए बाध्य किया जाए तो इससे मध्यस्थता की पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य ही प्रभावित होगा।
अदालत ने कहा,
"वर्तमान समय में जब भारत विवाद मुक्त भारत की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब मध्यस्थता पर विशेष जोर दिया जा रहा है। ऐसे में किसी पक्ष को लिखित जवाब दाखिल करने के लिए बाध्य करना और उसका ध्यान फिर से प्रतिद्वंद्वी मुकदमेबाजी की ओर मोड़ना, मध्यस्थता को बढ़ावा देने की नीति के विपरीत होगा।"
इन परस्पर विरोधी फैसलों को देखते हुए हाईकोर्ट ने मामले को बड़ी पीठ के गठन के लिए मुख्य जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया ताकि इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर अंतिम और एकरूप निर्णय दिया जा सके।


