“कमाई नहीं है” कहकर मेंटेनेंस से नहीं बच सकता पति, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
Praveen Mishra
21 May 2026 11:49 AM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि कोई पति केवल यह कहकर पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण (Maintenance) की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसके पास नियमित आय का स्रोत नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी और नाबालिग बच्चों का आर्थिक रूप से पालन-पोषण करना पति का “पवित्र दायित्व” (Sacrosanct Duty) है।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने यह टिप्पणी उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें एक पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसे अपनी पत्नी और दो बेटियों को ₹11,000 प्रतिमाह प्रति व्यक्ति भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
पति ने दलील दी थी कि वह केवल कॉन्ट्रैक्ट आधार पर काम करता है और उसकी कोई स्थायी आय नहीं है। उसने यह भी कहा कि वह तपेदिक (Tuberculosis), मधुमेह (Diabetes) और हृदय संबंधी बीमारियों से पीड़ित है। साथ ही उसने अपनी वृद्ध मां की जिम्मेदारी और बकाया ऋणों का हवाला देते हुए कहा कि वह इतनी राशि देने की स्थिति में नहीं है।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि उसकी पत्नी कॉमर्स ग्रेजुएट है, नौकरी करने में सक्षम है और पहले एक निजी कंपनी में काम भी कर चुकी है, जिसकी जानकारी उसने अपनी आय संबंधी हलफनामे में छिपाई।
वहीं पत्नी की ओर से कहा गया कि पति द्वारा बीमारी, आर्थिक तंगी और ऋण संबंधी जो दावे किए जा रहे हैं, वे फैमिली कोर्ट के समक्ष कभी नहीं उठाए गए थे और अब पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) में पहली बार उन्हें नहीं उठाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार (Revisional Jurisdiction) में हस्तक्षेप की सीमा बेहद सीमित होती है और पति यह साबित करने में विफल रहा कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या गंभीर विसंगति है।
अदालत ने यह भी पाया कि पति यह साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका कि पत्नी आर्थिक रूप से स्वयं और दोनों बेटियों का पालन-पोषण करने में सक्षम है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि “नियमित आय का स्रोत नहीं होने” का तर्क भरण-पोषण से बचने का आधार नहीं बन सकता।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों भुवन मोहन सिंह बनाम मीना (2015) और अंजू गर्ग बनाम दीपक कुमार गर्ग (2022) का हवाला देते हुए कहा कि पति अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता और आवश्यकता पड़ने पर शारीरिक श्रम करके भी पत्नी और बच्चों का पालन-पोषण करना उसका दायित्व है।
अदालत ने पति के अपने रिकॉर्ड और दस्तावेजों पर भी गौर किया, जिनसे पता चला कि उसके पास तकनीकी विशेषज्ञता है और वह पहले अच्छी तनख्वाह प्राप्त कर चुका है। रिकॉर्ड पर मौजूद वेतन पर्चियों के अनुसार, वर्ष 2021 में उसकी मासिक आय लगभग ₹40,000 थी, जबकि बैंक खातों में कई बार बड़ी रकम जमा होने के प्रमाण भी मिले, जिनमें लगभग ₹60,000 की एक एंट्री शामिल थी।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

