दिल्ली हाईकोर्ट ने मज़दूरों को कम वेतन और उनकी अनदेखी पर चिंता जताई, कहा- समाज उनके काम की अहमियत नहीं समझता
Shahadat
20 Sept 2026 6:13 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि समाज शारीरिक मेहनत करने वाले मज़दूरों के काम की अहमियत और उनका सम्मान करने में नाकाम रहा है, क्योंकि देश में उन्हें "सबसे कम वेतन मिलता है, उनकी सबसे कम परवाह की जाती है और उनकी सबसे कम चिंता की जाती है।"
जस्टिस विमल कुमार यादव ने यह टिप्पणी 2002 में शहर की लाजपत राय मार्केट में एक दुकान पर सो रहे मज़दूर पर हुए हमले से जुड़ी अपील पर सुनवाई करते हुए की।
कोर्ट ने अपील करने वाले वीर पाल की सज़ा को IPC की धारा 307 (हत्या की कोशिश) से बदलकर IPC की धारा 324 (खतरनाक हथियारों से जान-बूझकर चोट पहुंचाना) किया। कोर्ट ने माना कि मामले के तथ्यों से यह साबित नहीं हुआ कि आरोपी का इरादा या जानकारी ऐसी थी जिससे धारा 307 लागू हो सके।
ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा:
"दिन भर की कमर-तोड़ मेहनत के बाद शरीर को फिर से ताज़ा करने के लिए रात में अच्छी और शांतिपूर्ण नींद की ज़रूरत होती है, ताकि अगले दिन के कामों को किया जा सके, जिनमें हमेशा ही कड़ी शारीरिक मेहनत शामिल होती है। यह देश में मज़दूरों की आम और कभी न खत्म होने वाली दुर्दशा बन गई और जले पर नमक छिड़कने वाली बात यह है कि इस वर्ग को सबसे कम वेतन मिलता है, उनकी सबसे कम परवाह की जाती है और उनकी सबसे कम चिंता की जाती है। यह स्थिति बहुत दयनीय है, जहां समाज शारीरिक मेहनत की अहमियत और सम्मान करने में नाकाम रहा है, जबकि पश्चिमी देशों में शारीरिक मेहनत का उचित मेहनताना दिया जाता है और उसे महत्व दिया जाता है।"
कोर्ट पाल द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था। पाल को लाजपत राय मार्केट की एक दुकान पर काम करने वाले राजिंदर कुमार पर हमला करने के आरोप में दोषी ठहराया गया।
यह घटना 17 मार्च 2002 को हुई, जब राजिंदर दिन भर की शारीरिक मेहनत के बाद दुकान के बरामदे में सोने ही वाला था या सो रहा था।
पुलिस का आरोप है कि पाल और कुछ अन्य लोग झगड़ा कर रहे थे, जिससे राजिंदर को परेशानी हुई। जब राजिंदर ने उन्हें हंगामा न करने के लिए कहा तो पाल ने उसे धक्का दिया और 'रापी' (मोची द्वारा चमड़ा काटने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला औज़ार) से उस पर हमला कर दिया।
इस हमले से पाल के बाएँ गाल के ऊपरी हिस्से से लेकर छाती की हड्डी के गड्ढे (स्टर्नल नॉच) तक गहरा घाव हो गया, जिसमें उसकी गर्दन का बायाँ अगला हिस्सा भी शामिल था। हंगामा सुनकर एक पुलिस कॉन्स्टेबल ने पाल को पकड़ लिया, जबकि कुमार को ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया। ट्रायल कोर्ट ने पाल को IPC की धारा 307 के तहत अपराध का दोषी ठहराया और उसे पांच साल की कठोर कैद और 1,000 रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई।
अपील में पाल ने तर्क दिया कि घटना अचानक हुई और इसके पीछे कोई पहले से सोची-समझी योजना नहीं थी। यह भी कहा गया कि केवल एक बार वार किया गया और कुमार अपीलकर्ता के गुस्से का असली निशाना नहीं था।
जस्टिस यादव ने हत्या की कोशिश के अपराध से जुड़े सिद्धांतों की जांच की और कहा कि मुख्य सवाल यह है कि क्या पाल के मन में वह इरादा या जानकारी थी, जो किसी काम को हत्या की कोशिश की श्रेणी में लाने के लिए ज़रूरी होती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसे इरादे का पता कुल मिलाकर हालात से लगाया जाना चाहिए, जिसमें हथियार की प्रकृति, उसके इस्तेमाल का तरीका, मकसद, वार की गंभीरता और शरीर का वह हिस्सा शामिल है जहां चोट लगी थी।
कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 307 लागू होने के लिए ऐसी चोट का होना ज़रूरी नहीं है, जिससे मौत हो सके; इसके लिए ज़रूरी इरादे या जानकारी के साथ-साथ उस इरादे को पूरा करने के लिए कोई ठोस काम किया जाना ज़रूरी है।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, कोर्ट ने पाया कि पाल और कुमार का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है और वे आपस में लड़ या झगड़ नहीं रहे है।
कोर्ट ने पाया कि कुमार ने इसलिए दखल दिया, क्योंकि पाल और दूसरों के बीच हो रहे झगड़े से उसकी नींद में खलल पड़ रहा है।
कोर्ट ने कहा,
"हालात बताते हैं कि अपीलकर्ता और पीड़ित का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है, वे आपस में लड़ या झगड़ नहीं रहे है।"
कोर्ट ने पाया कि हालांकि इस्तेमाल किया गया हथियार खतरनाक है और जानलेवा हो सकता है, लेकिन उसका इस्तेमाल ऊपर से नीचे की ओर (वर्टिकल तरीके से) किया गया और पीड़ित को घोंपने (स्टैब करने) के लिए नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि अगर इसका इस्तेमाल घोंपने के लिए किया जाता, तो चोट गंभीर हो सकती थी।
कोर्ट ने यह भी बताया कि हालांकि मेडिकल भाषा में चोट को गंभीर कहा जा सकता है, लेकिन यह IPC की धारा 320 के तहत "गंभीर चोट" (Grievous Hurt) की परिभाषा में नहीं आती है।
कोर्ट ने कहा,
"इन तथ्यों को देखते हुए अपीलकर्ता को IPC की धारा 307 के तहत अपराध के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता," क्योंकि ज़रूरी इरादा या जानकारी मौजूद नहीं है। इसके अनुसार, कोर्ट ने पाल की सज़ा को IPC की धारा 307 से बदलकर कोड की धारा 324 के तहत किया।
सज़ा के सवाल पर कोर्ट ने ध्यान दिया कि घटना 2002 की थी और रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे पाल का पिछला संदिग्ध रिकॉर्ड या केस के बाद किसी और घटना में शामिल होने का पता चले।
इसलिए कोर्ट ने उसे तीन साल की सज़ा सुनाई, जबकि जुर्माना उतना ही रखा। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि वह CrPC की धारा 428 के तहत 'सेट-ऑफ' (पहले काटी गई सज़ा की अवधि को कुल सज़ा में से घटाने) का लाभ पाने का हकदार होगा।
Title: VEER PAL v. STATE

