UK हत्या मामले में वांछित व्यक्ति के प्रत्यर्पण पर दिल्ली हाईकोर्ट की रोक, चाकू मारने का प्रथम दृष्टया साक्ष्य नहीं
Praveen Mishra
20 March 2026 2:56 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने पंजाब के एक व्यक्ति को हत्या के मामले में यूनाइटेड किंगडम प्रत्यर्पित (extradite) करने की सिफारिश करने वाले आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह साबित करने के लिए कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है कि आरोपी ने ही चाकू से वार किया था और यह “महत्वपूर्ण कड़ी” केवल अनुमान और अटकलों पर आधारित है।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कंवरजीत सिंह बठ की याचिका स्वीकार करते हुए 2019 में एसीएमएम द्वारा दी गई उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया, जिसमें उसे हत्या के मुकदमे का सामना करने के लिए यूके भेजने की सिफारिश की गई थी।
अदालत ने कहा कि अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और घटनाओं की निकटता पर आधारित है, क्योंकि कोई भी प्रत्यक्षदर्शी यह नहीं देख पाया कि बठ ने मृतक को चाकू मारा था। यहां तक कि अभियोजन के तीन गवाहों के बयान को पूरी तरह मान भी लिया जाए, तब भी प्रथम दृष्टया हत्या का मामला स्थापित नहीं होता।
यह मामला वर्ष 2010 में यूके के स्लो (बर्कशायर) में हुई एक घटना से जुड़ा है, जहां एक पार्टी के दौरान एक व्यक्ति की चाकू लगने से मृत्यु हो गई थी। इस मामले में यूके ने भारत सरकार से प्रत्यर्पण का अनुरोध किया था, जिसके तहत प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 के अंतर्गत कार्यवाही शुरू की गई और एसीएमएम ने प्रथम दृष्टया मामला मानते हुए प्रत्यर्पण की सिफारिश की थी।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि घटना दुर्घटनावश हुई थी, प्रस्तुत दस्तावेज़ों में खामियां हैं और कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है जो यह दिखाए कि घातक वार उसी ने किया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रत्यर्पण की कार्यवाही में केवल यह देखा जाता है कि क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है, न कि तथ्यों के विभिन्न संस्करणों का मूल्यांकन कर यह तय किया जाए कि कौन सा अधिक संभावित है।
अदालत ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष कोई डीएनए या फिंगरप्रिंट साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया, जो आरोपी को कथित हथियार से जोड़ सके। फॉरेंसिक रिपोर्ट में हथियार का प्रकार तो बताया गया, लेकिन उसे आरोपी से नहीं जोड़ा गया।
इन सभी तथ्यों को देखते हुए अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष प्रथम दृष्टया भी हत्या का मामला स्थापित करने में असफल रहा है, और इसलिए प्रत्यर्पण की सिफारिश उचित नहीं थी।

