दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया मध्य प्रदेश सरकार को सीनियर एडवोकेट को ₹78 लाख से ज़्यादा फीस देने का आदेश
Shahadat
1 Sept 2026 8:09 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि वह सीनियर एडवोकेट अनूप जॉर्ज चौधरी को सुप्रीम कोर्ट में मामले में पेश होने के लिए ₹78,65,000 और उस पर 9% सालाना ब्याज का भुगतान करे। कोर्ट ने राज्य के इस दावा खारिज किया कि सीनियर वकील असल में सिर्फ़ दो बार पेश हुए।
जस्टिस सचिन दत्ता ने 'इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मनोहरलाल और अन्य (2020)' मामले में सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच (संविधान पीठ) की ऑर्डर शीट का हवाला दिया और सीनियर वकील की मौजूदगी को नोट किया।
बेंच ने कहा:
"इसलिए कार्यवाही के रिकॉर्ड में दिख रही पेशी से इसमें कोई शक नहीं रह जाता कि याचिकाकर्ता मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए। इस रिकॉर्ड के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। सुप्रीम कोर्ट में पेशी दर्ज करना कोई अनौपचारिक या सामान्य काम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट रूल्स, 2013 के ऑर्डर IV नियम 1(b) के तहत किसी पार्टी के 'एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड' के अलावा कोई अन्य वकील किसी मामले में कोर्ट के सामने पेश नहीं हो सकता, बहस नहीं कर सकता और कोर्ट को संबोधित नहीं कर सकता, जब तक कि उसे 'एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड' ने निर्देश न दिया हो या कोर्ट ने अनुमति न दी हो।"
कोर्ट ने कहा कि एक सीनियर एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट में किसी पार्टी पर "अपनी पेशी थोप" नहीं सकता। उसकी पेशी केवल उस पार्टी के 'एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड' के माध्यम से और उनके निर्देशों पर ही दर्ज की जा सकती है।
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की पेशी राज्य के स्टैंडिंग काउंसिल और राज्य के 'एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड' के साथ "चौदह तारीखों" पर दर्ज की गई, इसलिए यह निष्कर्ष निकला कि ऐसी हर तारीख पर उनकी पेशी राज्य के ही अधिकृत प्रतिनिधियों द्वारा कराई गई।
कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज किया कि सीनियर वकील "असल में" केवल दो मौकों पर पेश हुए, क्योंकि यह रिकॉर्ड के खिलाफ है। इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि यह मानने का कोई आधार नहीं है कि कॉन्स्टिट्यूशन बेंच के सामने चल रही अंतिम सुनवाई (जो कई चरणों में हो रही हो) में शामिल सीनियर एडवोकेट को केवल उन्हीं तारीखों के लिए फीस मिलेगी जिन तारीखों पर उन्होंने अपनी दलीलें पेश की थीं।
कोर्ट ने कहा,
"याचिकाकर्ता के सभी चौदह तारीखों पर पेश होने का रिकॉर्ड खुद सुप्रीम कोर्ट ने रखा है; कम-से-कम दो तारीखों (19.11.2019 और 11.12.2019) पर आदेशों में साफ तौर पर दर्ज है कि उन्होंने अपनी बात रखी और उन्हें सुना गया। उन्हें फीस पाने का हक मामले में शामिल रहने की हर तारीख के लिए है, न कि सिर्फ़ उन तारीखों के लिए जब उन्होंने ज़बानी दलीलें दी थीं।"
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि एडवोकेट जनरल की बुलाई गई 01.11.2025 की बैठक में तत्कालीन मुख्य सचिव ने IDA मामले में राज्य की ओर से याचिकाकर्ता को शामिल किए जाने की बात मानी थी और स्वीकार किया कि उस मामले के लिए उनके बिल मौजूदा दरों पर प्रोसेस और सेटल किए जा सकते हैं। इसके बाद 08.05.2026 को राज्य की ओर से दाखिल लिखित दलीलों में हालांकि यह दावा किया गया कि याचिकाकर्ता का "इस मामले में शामिल होना ही विवादित है।"
कोर्ट ने ज़ोर देते हुए कहा,
"कानून विभाग के 11.02.2026 के पत्र में, जिसका ज़िक्र ऊपर किया गया, यहां तक कहा गया कि 'सीनियर एडवोकेट मिस्टर अनूप जॉर्ज चौधरी के माननीय सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश होने का कोई रिकॉर्ड नहीं है', और SLP (C) नंबर 9036/2016 में 'मध्य प्रदेश राज्य का प्रतिनिधित्व' किसी दूसरे वकील ने किया। याचिकाकर्ता के पेश होने का 'कोई रिकॉर्ड नहीं' होने का दावा सुप्रीम कोर्ट की चौदह ऑर्डर शीट और संविधान पीठ के फैसले के पैरा 8 से गलत साबित होता है। राज्य ने साथ ही यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को कभी शामिल नहीं किया गया, और यह भी कि उन्हें शामिल तो किया गया लेकिन वे 'असल में' सिर्फ़ दो तारीखों पर पेश हुए थे। ये दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं।"
कोर्ट ने आगे कहा कि अगर राज्य का यह तर्क था कि याचिकाकर्ता का पेश होना बिना अधिकार के था, तो राज्य की यह ज़िम्मेदारी थी कि वह कार्यवाही के रिकॉर्ड में सुधार की मांग करता, या कम से कम उसी समय विरोध दर्ज कराता।
कोर्ट ने कहा,
"ऐसा करने के बजाय, राज्य ने छह साल से ज़्यादा समय में कभी भी उन चौदह ऑर्डर शीट या संविधान पीठ के उस फैसले की समीक्षा, उसमें बदलाव या सुधार की मांग नहीं की, जिसमें याचिकाकर्ता की दलीलें दर्ज हैं। राज्य एक ही बात पर अलग-अलग रुख नहीं अपना सकता; यानी, वह उन कार्यवाही का फ़ायदा तो नहीं उठा सकता जिनमें याचिकाकर्ता ने उसका प्रतिनिधित्व किया। साथ ही उसकी नियुक्ति से ही इनकार नहीं कर सकता।"
कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज किया कि राज्य के विधि विभाग के रिकॉर्ड में कोई औपचारिक नियुक्ति आदेश या लिखित निर्देश मौजूद नहीं है। इस संबंध में विधि विभाग के 02.05.2024 और 11.02.2026 के पत्र राज्य के काम नहीं आ सकते।
कोर्ट ने कहा कि राज्य ने याचिकाकर्ता की प्रोफेशनल सेवाओं का फ़ायदा उठाया और उन्हें संविधान पीठ के सामने "चौदह तारीखों" पर अपने 'एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड' और 'स्टैंडिंग काउंसिल' के साथ पेश होने की इजाज़त भी दी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य ने उन्हें पीठ के सामने अपनी बात रखने की इजाज़त दी; उस फ़ैसले का फ़ायदा उठाया, जिसमें उनकी दलीलें दर्ज थीं; और चौदह ऑर्डर शीट या रिपोर्ट किए गए फ़ैसले में कभी कोई सुधार नहीं मांगा।
कोर्ट ने कहा कि राज्य के अपने 'स्टैंडिंग काउंसिल' और 'एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड' को याचिकाकर्ता के बिल मिले और उन्होंने उन्हें "मांगी गई फ़ीस के भुगतान" के लिए आगे बढ़ाया; राज्य के मुख्य सचिव ने भी याचिकाकर्ता की नियुक्ति को माना और बिलों की प्रोसेसिंग को मंज़ूरी दी।
कोर्ट ने कहा,
"ऐसा व्यवहार करने के बाद राज्य अब अपनी बात से पलटकर बाद में किए गए ऐसे विरोधाभासी इनकार [जो उसके अपने दस्तावेज़ों या सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड से गलत साबित होते हैं] को 'तथ्यों से जुड़े विवादित सवाल' नहीं कह सकता, जिनके आधार पर याचिकाकर्ता को सिविल केस करने के लिए कहा जाए।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि वकील की फ़ीस "सम्मान और कानूनी अधिकार, दोनों का मामला है"। कोर्ट ने कहा कि कानूनी उपाय होने का मतलब यह नहीं है कि सम्मान की ज़िम्मेदारी कम हो जाती है; बल्कि यह वह ज़रिया देता है जिससे, आखिरी उपाय के तौर पर, उस ज़िम्मेदारी को पूरा किया जा सके।
कोर्ट ने आगे कहा,
"आम तौर पर सीनियर वकीलों के पद/स्टेटस में गिरावट देखना चिंताजनक है, जो बकाया फ़ीस के दावों को लेकर सीनियर वकीलों द्वारा दायर मुकदमों की बढ़ती संख्या से पता चलता है... एक वकील को संविधान पीठ के सामने एक अहम मामले में पेश होने की फ़ीस वसूलने के लिए छह साल से ज़्यादा समय तक रिट याचिका लड़नी पड़े - जबकि सुप्रीम कोर्ट के अपने आदेशों में यह बात दर्ज हो और राज्य के विभाग आपस में ज़िम्मेदारी एक-दूसरे पर डालते रहें - यह संस्थागत चिंता का विषय है। इससे वकील का नहीं, बल्कि राज्य का सम्मान कम होता है।"
कोर्ट ने कहा कि अगर राज्यों को "ज़रूरत के समय बार के सबसे सीनियर सदस्यों की सेवाओं का इस्तेमाल करने" और उसके बाद उनके बिलों को विभागीय इनकार के चक्कर में फंसाए रखने की इजाज़त दी जाती है तो इसका नतीजा यह होगा कि बार के काबिल सदस्य राज्य की ओर से पेश होने से कतराने लगेंगे। इस तरह कोर्ट ने मध्य प्रदेश को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को 6 हफ़्ते के अंदर ₹78,65,000 का भुगतान करे। साथ ही इस रकम पर मौजूदा याचिका दायर करने की तारीख से लेकर भुगतान की तारीख तक 9% सालाना की दर से ब्याज भी दे।
याचिका को आंशिक रूप से मंज़ूर किया गया।
Case title: ANOOP GEORGE CHAUDHARI v/s STATE OF MADHYA PRADESH


