दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक माह के विरोध-प्रदर्शन प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट का नोटिस
Praveen Mishra
25 Feb 2026 3:52 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को उस याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी स्थित दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके परिसरों में एक माह तक सभी प्रकार के विरोध-प्रदर्शनों और सार्वजनिक बैठकों पर प्रतिबंध लगाने वाली अधिसूचना को चुनौती दी गई है।
जस्टिस जस्मीत सिंह ने विश्वविद्यालय के छात्र उदय भदौरिया द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में 17 फरवरी को प्रॉक्टर कार्यालय द्वारा जारी उस अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसे यूजीसी के इक्विटी नियमों के समर्थन में हुए प्रदर्शन के दौरान हुई झड़पों के बाद जारी किया गया था। याचिका अधिवक्ता अभिषेक और अमन रावत के माध्यम से दाखिल की गई है।
प्रारंभ में विश्वविद्यालय की ओर से पेश वकील ने कहा कि याचिका जनहित याचिका (PIL) के स्वरूप की है। उन्होंने यह भी बताया कि दिल्ली पुलिस द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 लागू की गई है, जबकि पुलिस को पक्षकार नहीं बनाया गया है। इसे “अधूरी याचिका” बताया गया।
इसके बाद न्यायालय ने मामले को पीआईएल पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए भेज दिया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश शामिल हैं, तथा मौखिक अनुरोध पर दिल्ली पुलिस को भी प्रतिवादी बनाया गया।
न्यायालय ने कहा, “मौखिक अनुरोध पर दिल्ली पुलिस को प्रतिवादी संख्या 6 के रूप में जोड़ा जाता है। संशोधित ज्ञापन दाखिल किया जाए। दिल्ली पुलिस की ओर से वकील नोटिस स्वीकार करते हैं। याचिका को पीआईएल माना जाए और औपचारिकताएं पूरी होने के बाद इसे 10 मार्च को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए। अंतरिम राहत की अर्जी भी साथ में रखी जाए।”
भदौरिया ने किरोड़ी मल कॉलेज और दयाल सिंह कॉलेज द्वारा जारी बाद की अधिसूचनाओं को भी चुनौती दी है, जिनमें प्रतिबंध को और सख्ती से लागू किया गया। याचिका में यह भी उल्लेख है कि वर्तमान स्थिति के कारण प्रशासनिक कारण बताते हुए दयाल सिंह ईवनिंग कॉलेज का वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम “रजनीगंधा-2026” स्थगित कर दिया गया।
याचिका में कहा गया है कि विवादित अधिसूचना परिसर में शांतिपूर्ण सभा, अभिव्यक्ति और भाषण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), (b) और (d) द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
भदौरिया ने कहा कि यह आदेश उन्हें सीधे प्रभावित करता है क्योंकि इससे उनकी अकादमिक चर्चाओं, शांतिपूर्ण सभाओं, छात्र सहभागिता और परिसर जीवन की अन्य वैध गतिविधियों में भाग लेने की क्षमता सीमित हो गई है।
याचिका में आगे कहा गया है कि इस आदेश का व्यापक प्रभाव विश्वविद्यालय में छात्र भागीदारी और वास्तविक शैक्षणिक विमर्श को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।
याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि यह आदेश तर्कसंगतता और आनुपातिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, क्योंकि इसमें कम कठोर उपायों—जैसे नियंत्रित अनुमति, निर्धारित स्थान या लक्षित प्रतिबंध—पर विचार किए बिना पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। अतः यह आदेश मनमाना है और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।

