CPC: कोर्ट में की गई साफ स्वीकारोक्ति को बाद में बदलने के लिए संशोधन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता- दिल्ली हाईकोर्ट

Praveen Mishra

29 March 2026 5:43 PM IST

  • CPC: कोर्ट में की गई साफ स्वीकारोक्ति को बाद में बदलने के लिए संशोधन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता- दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी पक्ष को अपनी दलीलों (pleadings) में की गई स्पष्ट और ठोस स्वीकारोक्ति (admission) से पीछे हटने की अनुमति नहीं दी जा सकती, खासकर जब इससे विरोधी पक्ष को महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हो चुके हों। अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए एक सिंगल जज के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें प्रतिवादी को चार वर्ष से अधिक समय बाद अपना लिखित बयान संशोधित करने की अनुमति दी गई थी।

    जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेणु भटनागर की डिवीजन बेंच ने कहा कि यद्यपि संशोधन की शक्ति व्यापक है और अदालतें सामान्यतः उदार दृष्टिकोण अपनाती हैं, लेकिन इस अधिकार पर कुछ स्थापित सीमाएं भी लागू होती हैं। इनमें से एक यह है कि कोई पक्ष अपनी स्पष्ट और श्रेणीबद्ध स्वीकारोक्ति को वापस नहीं ले सकता, विशेषकर तब जब उससे दूसरे पक्ष को मूल्यवान अधिकार प्राप्त हुए हों।

    यह मामला ग्रीन पार्क स्थित एक संपत्ति को लेकर पारिवारिक विवाद से जुड़ा था, जिसमें वादी ने घोषणा, बंटवारा और निषेधाज्ञा की मांग की थी। वर्ष 2019 में दाखिल लिखित बयान में एक प्रतिवादी ने वादी के दावे का समर्थन करते हुए संपत्ति के बराबर बंटवारे को स्वीकार किया था और कथित वसीयत के बारे में अनभिज्ञता जताई थी।

    हालांकि, चार वर्ष से अधिक समय बाद उसी प्रतिवादी ने अपने लिखित बयान में संशोधन की मांग करते हुए पूरी तरह विपरीत रुख अपना लिया। प्रस्तावित संशोधन में उसने वसीयत की वैधता का समर्थन किया, संपत्ति को स्वयं अर्जित बताया और बंटवारे के दावे का विरोध किया।

    हाईकोर्ट ने पाया कि प्रस्तावित संशोधन केवल स्पष्टीकरण नहीं है, बल्कि यह पहले की स्वीकारोक्तियों को समाप्त कर पूरी तरह नया और विपरीत मामला प्रस्तुत करता है। अदालत ने कहा कि लिखित बयान में की गई स्वीकारोक्तियां महत्वपूर्ण साक्ष्य होती हैं और उनसे वादी को प्राप्त होने वाले कानूनी लाभ को इस प्रकार के संशोधन के माध्यम से छीना नहीं जा सकता।

    अदालत ने यह भी कहा कि प्रतिवादी द्वारा दी गई यह दलील कि पहले का रुख गलती के कारण अपनाया गया था, बाद में गढ़ी गई प्रतीत होती है और इसे bona fide नहीं माना जा सकता। साथ ही, चार वर्षों से अधिक की देरी को भी अदालत ने महत्वपूर्ण माना और कहा कि बिना संतोषजनक कारण के इतनी देरी से किया गया संशोधन स्वीकार्य नहीं है।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने सिंगल जज के आदेश को रद्द करते हुए संशोधन आवेदन को खारिज कर दिया।

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