आत्महत्या सभ्य दुनिया की समस्या, जो तनाव और सामाजिक दबाव से पैदा होती है: दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में व्यक्ति को दोषी ठहराया

Shahadat

19 March 2026 9:58 AM IST

  • आत्महत्या सभ्य दुनिया की समस्या, जो तनाव और सामाजिक दबाव से पैदा होती है: दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में व्यक्ति को दोषी ठहराया

    दिल्ली हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि आत्महत्या तेज़ी से "सभ्य दुनिया की एक समस्या" बनती जा रही है, जो अक्सर तनाव, सामाजिक दबाव और सहयोग प्रणालियों के टूटने के कारण होती है। कोर्ट ने यह टिप्पणी अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में एक व्यक्ति को दोषी ठहराते हुए की।

    जस्टिस विमल कुमार यादव ने ये टिप्पणियां पति द्वारा दायर अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कीं। उन्होंने पति की सज़ा को IPC की धारा 304B (दहेज मृत्यु) से बदलकर IPC की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत कर दिया, जबकि IPC की धारा 498A (क्रूरता) के तहत उसकी सज़ा बरकरार रखी।

    आत्महत्या की प्रकृति पर विचार करते हुए कोर्ट ने कहा कि जीवित रहने की प्रवृत्ति सभी जीवित प्राणियों में बुनियादी होती है और अपनी जान लेना अक्सर ऐसी मज़बूर करने वाली परिस्थितियों का परिणाम होता है, जो इस प्रवृत्ति पर हावी हो जाती हैं।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "आत्महत्या सभ्य दुनिया की समस्या लगती है, क्योंकि आदिवासी समाजों में इसके बारे में शायद ही कभी सुना जाता था। हालांकि, सभ्य दुनिया के प्रवेश के साथ ही यह आदिवासी समाजों में भी प्रवेश कर गई है। आदिवासी या तथाकथित असभ्य समाजों की ताकत—यानी मज़बूत सामाजिक और पारिवारिक बंधन—अब तनाव, दबाव और चिंताओं आदि के कारण कमज़ोर पड़ रही है, जिससे वहां भी आत्महत्याओं को पैर जमाने का मौका मिल रहा है। यदि कोई आत्महत्या करता है तो निश्चित रूप से बहुत ही मज़बूर करने वाली परिस्थितियां रही होंगी, जहां आत्महत्या की प्रवृत्तियां जीवित रहने की प्रवृत्ति पर हावी हो जाती हैं और इसका परिणाम मृत्यु होता है।"

    यह मामला जुलाई 1999 में अपीलकर्ता की पत्नी की मृत्यु से संबंधित है, जो शादी के सात साल के भीतर हुई थी। उसकी मृत्यु किसी ऐसे पदार्थ का सेवन करने से हुई, जिसके ज़हर होने का संदेह था।

    अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि मृतका को ₹50,000 की दहेज की मांगों के संबंध में प्रताड़ित किया गया, जिसमें से ₹30,000 उसके परिवार द्वारा पहले ही चुका दिए गए। यह आरोप लगाया गया कि शेष राशि के लिए उसे लगातार दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा।

    मृतका के माता-पिता और भाई की गवाही के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को IPC की धारा 498A और 304B के तहत दोषी ठहराया और उसे सात साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई। अपील पर हाईकोर्ट ने पाया कि जहां दहेज की मांगों के संबंध में उत्पीड़न और क्रूरता साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद थी, वहीं यह दिखाने के लिए कोई निर्णायक सबूत नहीं था कि अपीलकर्ता ने मृतक की मृत्यु का कारण बनाया था।

    कोर्ट ने मृतक के भाई को दिए गए कथित 'डाइंग डिक्लेरेशन' (मृत्यु-पूर्व बयान) पर संदेह व्यक्त किया और उसके बयान में विसंगतियों तथा मेडिकल रिकॉर्ड में इस बात का उल्लेख किया कि मृतक उस समय बयान देने की स्थिति में नहीं थी।

    इन परिस्थितियों में कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष IPC की धारा 304B के तहत 'दहेज मृत्यु' के लिए दोषसिद्धि को बनाए रखने हेतु आवश्यक तत्वों को साबित करने में विफल रहा है।

    कोर्ट ने कहा,

    "...जहां तक उसकी मृत्यु से ठीक पहले उसे उत्पीड़न और क्रूरता का शिकार बनाए जाने की बात है, जैसा कि ऊपर बताया गया है, उसके लिए कोई निश्चित तारीख और समय आदि उपलब्ध नहीं है।"

    हालांकि, कोर्ट ने माना कि सबूतों से स्पष्ट रूप से यह साबित होता है कि मृतक को दहेज के लिए लगातार परेशान किया जा रहा था, जिससे ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गईं, जो उसे अपनी जान लेने के लिए मजबूर कर सकती थीं।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "इस बात की संभावना है कि मृतक ने स्वयं ही, अपने जीवन से तंग आकर, अपनी चाय में कोई ज़हरीला पदार्थ मिला लिया हो या डाल दिया हो और आत्महत्या कर ली हो। एकमात्र अन्य संभावना यह है कि अपीलकर्ता या अपीलकर्ता के परिवार के किसी अन्य सदस्य ने मृतक की चाय में कुछ मिला दिया हो। सामान्यतः, रसोई की देखभाल परिवार की महिलाएं ही करती हैं। इसलिए इन परिस्थितियों में यह अत्यंत असंभावित है कि किसी अन्य व्यक्ति की पहुंच रसोई तक या उस चाय तक रही हो जिसे मृतक अपने और अपीलकर्ता के लिए बना या परोस रही थी।"

    यह मानते हुए कि लगातार उत्पीड़न के कारण मृतक के पास कोई अन्य विकल्प शेष नहीं बचा था, कोर्ट ने अपीलकर्ता को IPC की धारा 306 के तहत दोषी ठहराया।

    अंत में इस बात को ध्यान में रखते हुए कि अपीलकर्ता पहले ही तीन वर्ष और आठ माह से अधिक समय जेल में बिता चुका है, और घटना के बाद से बीत चुके समय को देखते हुए कोर्ट ने उसकी सज़ा घटाकर उस अवधि के बराबर की, जो वह पहले ही जेल में बिता चुका है।

    Case title: Veer Pal v. State

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