सहमति से विवाह करने वाले वयस्कों को सामाजिक मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
Praveen Mishra
6 Feb 2026 1:19 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने वाले सहमति से विवाह करने वाले वयस्कों को समाज या माता-पिता की मंज़ूरी की आवश्यकता नहीं है और न ही कोई व्यक्ति या संस्था उनके इस निर्णय में दख़ल दे सकती है।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि सहमति से विवाह करने का निर्णय पूरी तरह पवित्र है और ऐसे निर्णय को सम्मान दिया जाना चाहिए, विशेषकर तब जब दोनों व्यक्ति वयस्क हों और उन्हें अपने जीवनसाथी चुनने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो।
अदालत ने दोहराया कि विवाह करने का अधिकार मानवीय स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है। यह अधिकार न केवल मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में निहित है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का भी अहम पहलू है। अनुच्छेद 21 सभी व्यक्तियों को, विशेष रूप से सहमति से निर्णय लेने वाले वयस्कों को, अपने निजी विकल्पों—खासतौर पर विवाह जैसे मामलों—में स्वतंत्रता देता है।
ये टिप्पणियां अदालत ने एक विवाहित दंपति की याचिका स्वीकार करते हुए कीं, जिसमें दोनों सहमति से वयस्क याचिकाकर्ताओं ने महिला के पिता द्वारा दी जा रही धमकियों के मद्देनज़र पुलिस सुरक्षा की मांग की थी। दंपति ने बताया कि उन्होंने जुलाई 2025 में आर्य समाज मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया और बाद में उसे सक्षम प्राधिकारी के समक्ष पंजीकृत भी कराया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि विवाह के विरोध के चलते महिला के पिता की ओर से उन्हें लगातार धमकियां मिल रही थीं, जिससे उनकी जान-माल को खतरा उत्पन्न हो गया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने महिला के खिलाफ दर्ज एफआईआर से संबंधित कथित दमनात्मक कार्रवाई को चुनौती देने की मांग भी वापस ले ली।
दंपति को पुलिस सुरक्षा प्रदान करते हुए अदालत ने कहा:
“चूंकि याचिकाकर्ता दोनों वयस्क हैं और अपनी मर्ज़ी से एक-दूसरे से विवाह करने के पूर्ण अधिकार में हैं, इसलिए अब समाज, राज्य की मशीनरी या यहां तक कि उनके माता-पिता/रिश्तेदार/मित्र भी उनके इस निर्णय में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकते।”
अदालत ने आगे कहा कि किसी भी व्यक्ति—विशेषकर महिला के पिता—को याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता को खतरे में डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि व्यक्तिगत निर्णयों के लिए उन्हें किसी सामाजिक स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।
अंततः अदालत ने संबंधित पुलिस को दंपति को आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया और यह भी अनुमति दी कि आवश्यकता पड़ने पर वे सीधे संबंधित थाने के स्टेशन हाउस ऑफिसर या बीट अधिकारियों से संपर्क कर सकें। साथ ही, यह स्पष्ट किया गया कि यदि दंपति अपना निवास स्थान बदलते हैं, तो निरंतर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना देना आवश्यक होगा।

